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“मैं वह नदी हूँ जो कभी सूखती नहीं”—यह केवल कविता नहीं, यह जीवन-दर्शन है।यह सिखाती है—गहराई से महसूस करनाईमानदारी से प्रेम करनालेकिन स्वयं को न खोनामौन भी शक्ति हो सकता है।निरंतरता ही असली विजय है।डिस्क्लेमरयह लेख पूरी तरह साहित्यिक और दार्शनिक अभिव्यक्ति है।यह भावनाओं के दमन, अहंकार या संबंध-विरोधी सोच को बढ़ावा नहीं देता।पाठकों की व्यक्तिगत अनुभूति के अनुसार अर्थ भिन्न हो सकते हैं।कीवर्ड्स (Keywords)आत्मसम्मान, भावनात्मक परिपक्वता, नदी का प्रतीक, दार्शनिक कविता, प्रेम और पहचान, आंतरिक शक्तिहैशटैग (Hashtags)#हिंदी_कविता#दार्शनिक_विचार#आत्मसम्मान#नदी_का_प्रतीक#मौन_शक्ति#प्रेम_और_पहचान

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शीर्षक मैं वह नदी हूँ जो कभी सूखती नहीं कविता अपनी खूबसूरती से मुझे भुलाने की कोशिश मत करो, क्योंकि खूबसूरती मेरी कमजोरी नहीं। मैं आँखों के आँसुओं की तरह बह नहीं जाता, मैं गहराई हूँ—कोई क्षणिक कहानी नहीं। मैं किसी पल का दर्द नहीं हूँ, न ही रात की खोई हुई आह। मैं वह नदी हूँ जो कभी सूखती नहीं, खामोशी में भी जिसकी पहचान है। मैं मुड़ता हूँ, समय से गुजरता हूँ, आँधियों और सूखे को सहता हूँ। फिर भी मैं मैं ही रहता हूँ, निश्चल शक्ति में खुद को रखता हूँ। विश्लेषण यह कविता प्रेम या सुंदरता के विरोध में नहीं है। यह कविता अपने अस्तित्व को खो देने के विरोध में है। यहाँ दो प्रतीक बहुत स्पष्ट हैं— आँसू: क्षणिक भावनाएँ, तीव्र लेकिन अस्थायी नदी: निरंतरता, स्मृति, आत्म-पहचान और स्थायित्व कवि यह नहीं कहता कि वह भावनाहीन है। वह कहता है कि वह भावनाओं में बहकर स्वयं को मिटाता नहीं। यह अहंकार नहीं—यह आत्मसम्मान है। दर्शन (Philosophy) इस रचना का दर्शन शांत लेकिन गहरा है। प्रेम का अर्थ स्वयं को मिटा देना नहीं संवेदना का अर्थ टूट जाना नहीं मौन का अर्थ कमजोरी नहीं नदी शोर नहीं करती, फिर भी वह पहाड़ों ...