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नीचे आपकी कहानी का हिंदी संस्करण – भाग 3 (Part 3) दिया गया है।यह भाग 1 और 2 का स्वाभाविक क्रम है और उसी शांत, गहरे और प्रकाशन-योग्य अंदाज़ में लिखा गया है।जब क़ानून स्पष्ट हो, लेकिन दिल टूट जाएभाग 3: अपने ही परिवार में मानसिक अकेलापनभीड़ में अकेला हो जानाउत्तराधिकार से वंचित होने का सबसे गहरा असर पैसों पर नहीं,अकेलेपन पर पड़ता है।यह अकेलापन बाहर से नहीं आता।यह भीतर से, अपने ही परिवार के बीच पैदा होता है।आप वही इंसान रहते हैं—वही चेहरा, वही रिश्ता, वही खून—

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नीचे आपकी कहानी का हिंदी संस्करण – भाग 3 (Part 3) दिया गया है। यह भाग 1 और 2 का स्वाभाविक क्रम है और उसी शांत, गहरे और प्रकाशन-योग्य अंदाज़ में लिखा गया है। जब क़ानून स्पष्ट हो, लेकिन दिल टूट जाए भाग 3: अपने ही परिवार में मानसिक अकेलापन भीड़ में अकेला हो जाना उत्तराधिकार से वंचित होने का सबसे गहरा असर पैसों पर नहीं, अकेलेपन पर पड़ता है। यह अकेलापन बाहर से नहीं आता। यह भीतर से, अपने ही परिवार के बीच पैदा होता है। आप वही इंसान रहते हैं— वही चेहरा, वही रिश्ता, वही खून— लेकिन व्यवहार बदल जाता है। बातें कम होने लगती हैं। सलाह नहीं माँगी जाती। निर्णयों में आपकी मौजूदगी ज़रूरी नहीं रह जाती। आप वहाँ होते हैं, लेकिन महसूस नहीं किए जाते। अदृश्य हो जाने की पीड़ा कोई आपको खुलकर नहीं निकालता। कोई साफ़ शब्दों में नहीं कहता— “तुम अब मायने नहीं रखते।” लेकिन धीरे-धीरे यह एहसास गहराता जाता है। आपकी राय टाल दी जाती है आपकी ज़रूरतों को “बाद में” रखा जाता है आपकी परेशानियों को सामान्य मान लिया जाता है यह खुला अपमान नहीं है, लेकिन यह लगातार उपेक्षा है। और लगातार उपेक्षा इंसान को भीतर से तोड़ देत...