हिंदी ब्लॉग – भाग 2बिना नक़्शे के जीनादेश खोने के बाद जीवन रुकता नहीं—लेकिन नक़्शा खो जाता है।जो चिन्ह कभी रास्ता दिखाते थे,वे धीरे-धीरे मिट जाते हैं।त्योहार आते हैं, पर आनंद नहीं आता।राष्ट्रीय दिवस आते हैं, पर अर्थ नहीं लाते।यहाँ तक कि शोक भी अटपटा लगता है,क्योंकि उसे साझा करने की भाषा नहीं बचती।तब मनुष्य सावधानी से जीता है—मानो अस्तित्व ही शर्तों पर टिका हो।विरासत में मिली चुप्पी
हिंदी ब्लॉग – भाग 2 बिना नक़्शे के जीना देश खोने के बाद जीवन रुकता नहीं— लेकिन नक़्शा खो जाता है। जो चिन्ह कभी रास्ता दिखाते थे, वे धीरे-धीरे मिट जाते हैं। त्योहार आते हैं, पर आनंद नहीं आता। राष्ट्रीय दिवस आते हैं, पर अर्थ नहीं लाते। यहाँ तक कि शोक भी अटपटा लगता है, क्योंकि उसे साझा करने की भाषा नहीं बचती। तब मनुष्य सावधानी से जीता है— मानो अस्तित्व ही शर्तों पर टिका हो। विरासत में मिली चुप्पी देश खोने का सबसे गहरा असर अगली पीढ़ी पर पड़ता है। बच्चे एक ऐसी कमी के साथ बड़े होते हैं जिसका नाम उन्हें नहीं बताया गया। उन्हें स्मृति के बिना उदासी मिलती है, इतिहास के बिना पीड़ा। माता-पिता अतीत की बातें अधूरे वाक्यों में करते हैं, अचानक रुक जाने वाली कहानियों में, लंबी चुप्पियों के बीच। इसी तरह नुकसान पीढ़ियों में उतर जाता है। स्मृति: सहारा भी, बोझ भी स्मृति एक अजीब सा आश्रय है। वह सुकून भी देती है, और बाँध भी लेती है। मन बार-बार उस समय में लौटता है जब स्वयं को साबित नहीं करना पड़ता था, जब भाषा सहज थी, जब जीना अपने आप में वैध था। लेकिन जब वर्तमान स्वीकार नहीं करता, तो अतीत भारी हो ज...