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जो स्वर मुझे बुलाए, जो आवाज़ मुझे रोक देचेतना के भीतर उतरती रातब्लॉग – भाग 11रुकने की कलाचलना सहज है।रुकना कठिन।चलते हुए हम दिशा भूल भी जाएँ,पर रुकते हुएहम खुद से टकराते हैं।उस रात रुकनामेरे लिए कोई नाटकीय निर्णय नहीं था।वह एक सूक्ष्म समझ थी—जैसे भीतर कोई धीमी रोशनी जली होऔर कह रही हो,अभी नहीं।रुकना हार नहीं।रुकना समय को सम्मान देना है।अनसुनी आवाज़ें

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जो स्वर मुझे बुलाए, जो आवाज़ मुझे रोक दे चेतना के भीतर उतरती रात ब्लॉग – भाग 11 रुकने की कला चलना सहज है। रुकना कठिन। चलते हुए हम दिशा भूल भी जाएँ, पर रुकते हुए हम खुद से टकराते हैं। उस रात रुकना मेरे लिए कोई नाटकीय निर्णय नहीं था। वह एक सूक्ष्म समझ थी— जैसे भीतर कोई धीमी रोशनी जली हो और कह रही हो, अभी नहीं। रुकना हार नहीं। रुकना समय को सम्मान देना है। अनसुनी आवाज़ें कभी-कभी सबसे ज़रूरी आवाज़ सबसे धीमी होती है। नूूपुर की झंकार ऊपर-ऊपर बह रही थी। कण्ठ की चेतावनी अंदर उतर रही थी। और उसके नीचे— एक तीसरी आवाज़ थी, मेरी अपनी। हम अक्सर दूसरों की आवाज़ें पहचान लेते हैं, पर अपनी नहीं। उस रात मैंने पहली बार अपनी आवाज़ सुनी। ब्लॉग – भाग 12 परछाईं का अर्थ परछाईं अंधेरे की संतान नहीं। वह रोशनी की सीमा है। जहाँ रोशनी थमती है, वहाँ परछाईं जन्म लेती है। तुम परछाईं की तरह थीं— पूरी तरह अंधेरी नहीं, पूरी तरह उजली भी नहीं। इसी बीच मेरा मन अटका रहा। जो स्पष्ट नहीं होता, वही सबसे अधिक खींचता है। अपूर्णता का आकर्षण पूर्णता स्थिर होती है। अपूर्णता चलायमान। हम अधूरेपन में अपनी उम्मीदें टाँग देते ...