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Hindi Version — PART 2 (जारी — मनोविज्ञान, स्मृति, सांझ और डर की जड़)(यह पिछले हिंदी ब्लॉग का अगला हिस्सा है। लगभग 1500+ शब्द।)🌔 PART 2 — मन के भीतर बने ‘भूत’ (Psychological Ghosts)डर हमेशा बाहर से नहीं आता।बहुत बार डर अंदर से उठता है—और बाहर की दुनिया को डरावना बना देता है।सांझ के किनारे पर खड़ा इंसानअपने भीतर की परछाइयों कोबाहर फैली छाया में देख लेता है।इसीलिए लगता है—कोई पुकार रहा है।कोई देख रहा है।कोई पास है।पर सच्चाई?वो सब भीतर है।

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Hindi Version — PART 2 (जारी — मनोविज्ञान, स्मृति, सांझ और डर की जड़) (यह पिछले हिंदी ब्लॉग का अगला हिस्सा है। लगभग 1500+ शब्द।) 🌔 PART 2 — मन के भीतर बने ‘भूत’ (Psychological Ghosts) डर हमेशा बाहर से नहीं आता। बहुत बार डर अंदर से उठता है— और बाहर की दुनिया को डरावना बना देता है। सांझ के किनारे पर खड़ा इंसान अपने भीतर की परछाइयों को बाहर फैली छाया में देख लेता है। इसीलिए लगता है— कोई पुकार रहा है। कोई देख रहा है। कोई पास है। पर सच्चाई? वो सब भीतर है। 🎭 1️⃣ मन कैसे ‘भूत’ रचता है? जब कोई घटना अधूरी रह जाती है— वो हमारी चेतना में “स्थिर छवि” बन जाती है। समय बीत जाता है, पर वह छवि वहीं रहती है। उदाहरण: बचपन में बरगद के पास डराया गया अचानक नाम लेकर किसी ने पीठ पीछे पुकारा एक रात धुंधली सी आहट महसूस हुई किसी अनजाने ने डर की कहानी सुना दी यह सब स्मृति बनता है। स्मृति → भावना भावना → भय भय → कल्पना कल्पना → “भूत जैसा एहसास” भूत का जन्म ऐसे होता है। 🧠 2️⃣ दिमाग के 3 हिस्से — और डर का खेल मस्तिष्क का हिस्सा क्या करता है Amygdala खतरा पहचानता है (भले गलत हो) Hippocampus जुड़ी यादें...