अस्वीकरण (Disclaimer)यह लेख दार्शनिक और विचारात्मक उद्देश्य से लिखा गया है। इसका उद्देश्य किसी धर्म, व्यक्ति या समुदाय को ठेस पहुँचाना नहीं है। यह लेख कर्म, नैतिकता और श्रम की गरिमा को उजागर करने का प्रयास है।🔑 कीवर्ड्स (Keywords)कर्म ही धर्मश्रम की गरिमाकर्म दर्शनजीवन मूल्यकर्तव्य और नैतिकता#️⃣ हैशटैग#कर्महीधर्म#श्रमकीगरिमा#जीवनदर्शन#मानवीयमूल्य#ईमानदारकर्म🧾 मेटा डिस्क्रिप्शनकर्म, कर्तव्य और श्रम की गरिमा पर आधारित एक गहन दार्शनिक लेख, जो बताता है कि कर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं।
कर्म से बंधा, धर्म से मुक्त क्यों कर्म ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है 🌿 कविता मुझे तेरी खुली आँखों से मत देख, मैं अपने ही कर्मों से बंधा हूँ। कर्म करना कोई शर्म नहीं, कर्म में ही मैं खड़ा हूँ। मैं नहीं माँगता सम्मान की भीख, ना दया की कोई नज़र। मेरे पसीने में लिखी है कहानी, मेरे हाथों में है मेरा सफ़र। अगर धर्म केवल शब्दों का शोर है, और कर्म अगर तुच्छ कहलाए, तो इंसान खो देता है खुद को, और भीतर से खाली रह जाए। मेरा परिचय मेरा काम है, मेरा रास्ता मेरा दायित्व। कर्म से बढ़कर कुछ भी नहीं, यही जीवन का सत्यत्व। 🧠 दार्शनिक विश्लेषण इस रचना का मूल भाव है — कर्म बनाम सामाजिक निर्णय। कवि समाज से कहता है: “मुझे अपनी आँखों से मत परखो, मैं अपने कर्मों से बंधा हूँ।” खुली आँखें होना समझदारी की गारंटी नहीं है। अक्सर लोग देखते हैं, पर समझते नहीं। यह कविता बाहरी आडंबर, पद, पहचान और दिखावे को अस्वीकार करती है और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी को सर्वोच्च मानती है। मुख्य दार्शनिक आधार: कर्म ही पहचान है — मनुष्य क्या करता है, वही उसका मूल्य है श्रम में लज्जा नहीं — ईमानदार काम कभी छोटा नहीं होता कर्म ह...