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हिंदी – भाग 2देखभाल और नियंत्रण के बीच की पतली रेखाइस कविता का सबसे असहज सत्य यह है किदेखभाल कितनी आसानी से नियंत्रण में बदल जाती है।वक्ता का कार्य जिम्मेदारी से भरा था। धुआँ बाहर निकलना चाहिए था, आग को हवा चाहिए थी। यह लापरवाही नहीं, बल्कि सजगता थी।लेकिन उसी सजगता को गलत तरीके से समझ लिया गया।मानव जीवन में यह दृश्य बार-बार दोहराया जाता है—माता-पिता का अत्यधिक संरक्षण,नेताओं का अत्यधिक शासन,संस्थाओं का अत्यधिक नियंत्रण।कविता हमें याद दिलाती है—

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हिंदी – भाग 2 देखभाल और नियंत्रण के बीच की पतली रेखा इस कविता का सबसे असहज सत्य यह है कि देखभाल कितनी आसानी से नियंत्रण में बदल जाती है। वक्ता का कार्य जिम्मेदारी से भरा था। धुआँ बाहर निकलना चाहिए था, आग को हवा चाहिए थी। यह लापरवाही नहीं, बल्कि सजगता थी। लेकिन उसी सजगता को गलत तरीके से समझ लिया गया। मानव जीवन में यह दृश्य बार-बार दोहराया जाता है— माता-पिता का अत्यधिक संरक्षण, नेताओं का अत्यधिक शासन, संस्थाओं का अत्यधिक नियंत्रण। कविता हमें याद दिलाती है— देखभाल के रूप में किया गया नियंत्रण भी नियंत्रण ही होता है। “पर्याप्त” शब्द मनुष्य को कठिन क्यों लगता है मानव मन के लिए “पर्याप्त” एक अस्थिर अवधारणा है। कम होना डर पैदा करता है, ज़्यादा होना सुरक्षा का भ्रम देता है। इसी डर के कारण मनुष्य सीमा लांघता है। ज़रूरत से अधिक जोड़ता है, जहाँ रुकना चाहिए, वहाँ आगे बढ़ जाता है। कविता में आग ज़रूरत के कारण नहीं बढ़ी, बल्कि इसलिए कि रुकना असहज लगा। यह कोई दानवी प्रवृत्ति नहीं— यह एक बहुत मानवीय कमजोरी है। आंतरिक अनुशासन के बिना शक्ति शक्ति स्वयं बुरी नहीं होती। आग स्वयं बुरी नहीं होती।...