Posts

Showing posts with the label समाज

हिंदी संस्करण | भाग 2पहचान, भावना और इतिहास का धीरे-धीरे बदलनाइतिहास अक्सर एक ही पल में नहीं बदलता।वह धीरे-धीरे बदलता है—पीढ़ी दर पीढ़ी,वाक्य दर वाक्य,भावना दर भावना।कर्बला की कथा भी भारतीय उपमहाद्वीप मेंइसी प्रक्रिया से गुज़री है।जब पहचान को नैतिक आधार चाहिए होता हैहर समाज, हर समुदाय एक समय परअपने अतीत में नैतिक आधार खोजता है।

Image
हिंदी संस्करण | भाग 2 पहचान, भावना और इतिहास का धीरे-धीरे बदलना इतिहास अक्सर एक ही पल में नहीं बदलता। वह धीरे-धीरे बदलता है— पीढ़ी दर पीढ़ी, वाक्य दर वाक्य, भावना दर भावना। कर्बला की कथा भी भारतीय उपमहाद्वीप में इसी प्रक्रिया से गुज़री है। जब पहचान को नैतिक आधार चाहिए होता है हर समाज, हर समुदाय एक समय पर अपने अतीत में नैतिक आधार खोजता है। लोग केवल यह नहीं पूछते— हमारे पूर्वज कौन थे? वे यह भी पूछते हैं— हम किसके पक्ष में खड़े हैं? यहीं पर ऐतिहासिक व्यक्तित्व नैतिक प्रतीक बन जाते हैं। कर्बला ऐसा ही एक प्रतीक बना। इमाम हुसैन को देखा गया— अन्याय के विरुद्ध खड़े व्यक्ति के रूप में शक्ति नहीं, सत्य को चुनने वाले के रूप में बलिदान से समझौता न करने वाले के रूप में इसलिए कर्बला से जुड़ना सत्ता से जुड़ना नहीं था, अंतरात्मा से जुड़ना था। नैतिक जुड़ाव से ऐतिहासिक दावा तक यहीं एक महत्वपूर्ण मोड़ आता है। पहले कहा जाता है— “हम इमाम हुसैन का सम्मान करते हैं।” फिर कहा जाता है— “हमारे पूर्वज उनकी स्मृति से जुड़े थे।” फिर धीरे-धीरे— “हम उनके साथ खड़े थे।” और अंत में— “हज़ारों की संख्या में हम...