भाग–2: साँझ का मनोविज्ञान — क्यों इस समय मन ज़्यादा सुनता हैसाँझ दुनिया को नहीं बदलती,साँझ हमें बदलती है।दिन भर मन सतर्क, तेज़ और नियंत्रित रहता है।लेकिन जैसे ही रोशनी ढलने लगती है, मन का भार हल्का होने लगता है।यही वह समय है जब खिड़की के पास सुना गया पक्षी का गीत भीतर तक उतर जाता है।🧠 1. साँझ का मन: जब प्रतिरोध कम होता हैदिन के समय मन एक कवच पहन लेता है—काम, ज़िम्मेदारी, लक्ष्य, दबाव।साँझ आते ही वह कवच ढीला पड़ने लगता है।थकान मन को कोमल बनाती हैशोर कम होता है, संवेदना बढ़ती हैसोच पीछे हटती है, अनुभूति आगे आती हैइसी अवस्था में छोटी-सी ध्वनि भी गहरी लगती है।पक्षी का गीत तब केवल आवाज़ नहीं रहता—
भाग–2: साँझ का मनोविज्ञान — क्यों इस समय मन ज़्यादा सुनता है साँझ दुनिया को नहीं बदलती, साँझ हमें बदलती है। दिन भर मन सतर्क, तेज़ और नियंत्रित रहता है। लेकिन जैसे ही रोशनी ढलने लगती है, मन का भार हल्का होने लगता है। यही वह समय है जब खिड़की के पास सुना गया पक्षी का गीत भीतर तक उतर जाता है। 🧠 1. साँझ का मन: जब प्रतिरोध कम होता है दिन के समय मन एक कवच पहन लेता है— काम, ज़िम्मेदारी, लक्ष्य, दबाव। साँझ आते ही वह कवच ढीला पड़ने लगता है। थकान मन को कोमल बनाती है शोर कम होता है, संवेदना बढ़ती है सोच पीछे हटती है, अनुभूति आगे आती है इसी अवस्था में छोटी-सी ध्वनि भी गहरी लगती है। पक्षी का गीत तब केवल आवाज़ नहीं रहता— वह अनुभव बन जाता है। 🎵 2. ध्वनि और स्मृति का गहरा संबंध मानव मस्तिष्क में स्मृतियाँ केवल चित्रों से नहीं जुड़ी होतीं। ध्वनि स्मृति को जगाने का सबसे प्रभावी माध्यम है। साँझ का पक्षी-गीत— बचपन की शांत शामों से जुड़ जाता है पुराने घर, आँगन या बगीचे की याद दिलाता है किसी भूले हुए सुकून को वापस ले आता है पक्षी कुछ कहना नहीं चाहता, लेकिन मन अपने आप कहानी सुनाने लगता है। 🪟 3....