मुख्य शब्द (Keywords)दार्शनिक कविताजीवन और मृत्यु दर्शनपत्थर का प्रतीकमौन और चेतनाअस्तित्व की खोज🏷️ हैशटैग#जीवनदर्शन#पत्थरकादर्शन#मौनकीशक्ति#अस्तित्व#मानवमन#आत्मचिंतन🧾 मेटा विवरण (Meta Description)पत्थर के प्रतीक के माध्यम से जीवन, मृत्यु और अस्तित्व पर एक गहन दार्शनिक चिंतन—जहाँ स्थिरता भी जीवन का रूप बन जाती है।यदि आप चाहें तो मैं इसे
जब पत्थर साँस लेने लगे (जीवन, मन और अस्तित्व का मौन दर्शन) कविता पत्थर भी जीवित है पत्थर के भी प्राण हैं, उसका भी है मन, तो फिर यह कैसा जीवन, और कैसी यह मरण? वह चलता नहीं, फिर भी युग बदलता है, वह बोलता नहीं, फिर भी बहुत कुछ समझाता है। बारिश उसकी स्मृति बनती है, आग उसके घाव लिखती है, समय थक जाता है चलते-चलते, पर पत्थर स्थिर रहता है। यदि मौन भी अनुभव करता है, यदि स्थिरता भी जानती है दर्द, तो मनुष्य क्यों काँपता है जीवन–मृत्यु के हर अर्थ से हर पल? हम दौड़ते हैं अर्थ के पीछे, अंत से रहते हैं भयभीत, पत्थर बस रहता है— न विजय, न पराजित। विश्लेषण और दर्शन यह रचना एक साधारण-सा प्रश्न उठाती है— क्या जीवन केवल गति का नाम है? हम मानते हैं कि जो चलता नहीं, वह मृत है। पत्थर इस धारणा को चुनौती देता है। वह न बोलता है, न बढ़ता है, फिर भी वह अस्तित्व में है, सहता है, साक्षी बनता है। मुख्य दार्शनिक विचार: स्थिरता भी जीवन है जीवन केवल गतिविधि नहीं, उपस्थिति भी है। समय से संघर्ष नहीं, सह-अस्तित्व मनुष्य समय से लड़ता है, पत्थर समय के साथ रहता है। मृत्यु का भय मानवीय रचना है पत्थर मृत्यु से नहीं ...