नीचे आपकी कहानी का हिंदी संस्करण – भाग 2 (Part 2) दिया गया है।यह भाग 1 का सीधा क्रम है और उसी शांत, गंभीर व प्रकाशन-योग्य भाषा में लिखा गया है।जब क़ानून स्पष्ट हो, लेकिन दिल टूट जाएभाग 2: नैतिक ज़िम्मेदारी, चुप्पी और बहिष्कार का बोझक़ानूनी अधिकार से आगे नैतिक ज़िम्मेदारीक़ानून यह तय करता है कि क्या अनुमत है।नैतिकता यह पूछती है कि क्या उचित है।मुस्लिम उत्तराधिकार क़ानून के अनुसार मेरा बाहर रहना सही है—इसमें कोई विवाद नहीं।लेकिन केवल क़ानूनी सही होना, पारिवारिक नैतिक ज़िम्मेदारी को समाप्त नहीं कर देता।इस्लामी क़ानू स्पष्ट है।
नीचे आपकी कहानी का हिंदी संस्करण – भाग 2 (Part 2) दिया गया है। यह भाग 1 का सीधा क्रम है और उसी शांत, गंभीर व प्रकाशन-योग्य भाषा में लिखा गया है। जब क़ानून स्पष्ट हो, लेकिन दिल टूट जाए भाग 2: नैतिक ज़िम्मेदारी, चुप्पी और बहिष्कार का बोझ क़ानूनी अधिकार से आगे नैतिक ज़िम्मेदारी क़ानून यह तय करता है कि क्या अनुमत है। नैतिकता यह पूछती है कि क्या उचित है। मुस्लिम उत्तराधिकार क़ानून के अनुसार मेरा बाहर रहना सही है—इसमें कोई विवाद नहीं। लेकिन केवल क़ानूनी सही होना, पारिवारिक नैतिक ज़िम्मेदारी को समाप्त नहीं कर देता। इस्लामी क़ानून स्पष्ट है। लेकिन इस्लामी नैतिकता करुणा से भरी हुई है। जब कोई नाति कम उम्र में पिता को खो देता है, तो वह सिर्फ़ एक “क़ानूनी स्थिति” नहीं होता। वह एक ऐसा इंसान होता है जो पहले ही नुकसान, असुरक्षा और निर्भरता से गुज़र चुका होता है। क़ानून भले ही दरवाज़ा बंद कर दे, नैतिकता अब भी एक खिड़की खोल कर रखती है। जब चुप्पी भी एक फैसला बन जाती है मेरे दादा के निधन के बाद कोई चर्चा नहीं हुई। कोई बातचीत नहीं। उनकी अधूरी इच्छा का कोई ज़िक्र नहीं। चुप्पी छा गई। और परिवारों...