जो दरवाज़ा मुझे खींच लाया, और जो ख़ुशियाँ मैंने तुम्हें सौंप दीं✍️ कविताहॉस्पिटल के दरवाज़े ने मुझे खींच लाया,ज़ोर से नहीं, किस्मत की ख़ामोश पुकार से।मैं खड़ा था अधूरी दुआओँ के साथ,और तेरी हँसी थी किसी और संसार में बसे।यहाँ वक़्त घड़ियाँ नहीं गिनता,यहाँ साँसों का हिसाब होता है।तेरी ख़ुशियों की भोजन तेरे नसीब हो,भले ही मेरा हिस्सा ख़ामोश रह जाता है।अगर दर्द को किसी कंधे की ज़रूरत हो,तो उसे मेरा ही सहारा मिले।
🌿 जो दरवाज़ा मुझे खींच लाया, और जो ख़ुशियाँ मैंने तुम्हें सौंप दीं ✍️ कविता हॉस्पिटल के दरवाज़े ने मुझे खींच लाया, ज़ोर से नहीं, किस्मत की ख़ामोश पुकार से। मैं खड़ा था अधूरी दुआओँ के साथ, और तेरी हँसी थी किसी और संसार में बसे। यहाँ वक़्त घड़ियाँ नहीं गिनता, यहाँ साँसों का हिसाब होता है। तेरी ख़ुशियों की भोजन तेरे नसीब हो, भले ही मेरा हिस्सा ख़ामोश रह जाता है। अगर दर्द को किसी कंधे की ज़रूरत हो, तो उसे मेरा ही सहारा मिले। मेरी प्रतीक्षा ही क़ीमत बन जाए, कि तेरी मुस्कान कभी कम न हो, कभी न ढले। 🌱 भूमिका हर प्रेम उजाले में खड़ा नहीं होता। कुछ प्रेम अस्पताल के दरवाज़ों के बाहर चुपचाप इंतज़ार करते हैं। पंक्ति— “हॉस्पिटल के दरवाज़े ने मुझे खींच लाया, तेरी ख़ुशियों की भोजन तेरे नसीब हो” उन अनगिनत लोगों की आवाज़ है, जो अपने दर्द को स्वीकार कर लेते हैं ताकि कोई और मुस्कराता रह सके। यह कविता शिकायत नहीं है। यह स्वीकार, त्याग और मौन आशीर्वाद की कविता है। 🧠 कविता का मूल अर्थ इस कविता के केंद्र में एक गहरी मानवीय भावना है— दूसरे के संपूर्ण रहने के लिए स्वयं अधूरा हो जाना। कवि नियति को...