क्या तुम वही समुंदर हो, जिसका कोई किनारा नहीं?कविताक्या तुम वही समुंदर हो,जिसका कोई किनारा नहीं,बहते हुए आँसुओं की तरहजो कभी सूखता नहीं?मैं रुक जाऊँ तब भी तुम बहते हो,मैं चुप रहूँ तब भी तुम बोलते हो,मेरे अधूरे सवालों मेंतुम्हारी गहराई खुलती है।तुम्हारी गहराई डराती भी है,और शरण भी देती है,
क्या तुम वही समुंदर हो, जिसका कोई किनारा नहीं? कविता क्या तुम वही समुंदर हो, जिसका कोई किनारा नहीं, बहते हुए आँसुओं की तरह जो कभी सूखता नहीं? मैं रुक जाऊँ तब भी तुम बहते हो, मैं चुप रहूँ तब भी तुम बोलते हो, मेरे अधूरे सवालों में तुम्हारी गहराई खुलती है। तुम्हारी गहराई डराती भी है, और शरण भी देती है, जैसे पीड़ा खुद मुझे थामना सीख जाती है। अगर तुम समुंदर हो, तो मैं वह तृष्णा हूँ— जो डूबकर भी कभी पूरी नहीं होती। कविता का विश्लेषण और दर्शन इस कविता का केंद्रीय रूपक है—“किनारों के बिना समुंदर”। किनारा सीमा, सुरक्षा और अंत का प्रतीक होता है। जब समुंदर का कोई किनारा नहीं होता, तो वह अनंत हो जाता है—वैसा ही जैसे कुछ भावनाएँ, कुछ रिश्ते और कुछ प्रश्न। “कभी न सूखने वाले आँसू” स्थायी भावनात्मक अवस्था का संकेत हैं। यह क्षणिक दुख नहीं, बल्कि ऐसा अनुभव है जो समय के साथ भी बना रहता है। दार्शनिक दृष्टिकोण अनंत भावनाएँ कुछ भावनाएँ समय से परे होती हैं। वे जीवन का चरण नहीं, जीवन की संरचना बन जाती हैं। दर्द कमजोरी नहीं, गहराई है कविता दर्द को नकारती नहीं, बल्कि उसे मानवीय चेतना का हिस्सा मानती...