क्या तुम वही समुंदर हो, जिसका कोई किनारा नहीं?कविताक्या तुम वही समुंदर हो,जिसका कोई किनारा नहीं,बहते हुए आँसुओं की तरहजो कभी सूखता नहीं?मैं रुक जाऊँ तब भी तुम बहते हो,मैं चुप रहूँ तब भी तुम बोलते हो,मेरे अधूरे सवालों मेंतुम्हारी गहराई खुलती है।तुम्हारी गहराई डराती भी है,और शरण भी देती है,
क्या तुम वही समुंदर हो, जिसका कोई किनारा नहीं?
कविता
क्या तुम वही समुंदर हो,
जिसका कोई किनारा नहीं,
बहते हुए आँसुओं की तरह
जो कभी सूखता नहीं?
मैं रुक जाऊँ तब भी तुम बहते हो,
मैं चुप रहूँ तब भी तुम बोलते हो,
मेरे अधूरे सवालों में
तुम्हारी गहराई खुलती है।
तुम्हारी गहराई डराती भी है,
और शरण भी देती है,
जैसे पीड़ा खुद
मुझे थामना सीख जाती है।
अगर तुम समुंदर हो,
तो मैं वह तृष्णा हूँ—
जो डूबकर भी
कभी पूरी नहीं होती।
कविता का विश्लेषण और दर्शन
इस कविता का केंद्रीय रूपक है—“किनारों के बिना समुंदर”।
किनारा सीमा, सुरक्षा और अंत का प्रतीक होता है। जब समुंदर का कोई किनारा नहीं होता, तो वह अनंत हो जाता है—वैसा ही जैसे कुछ भावनाएँ, कुछ रिश्ते और कुछ प्रश्न।
“कभी न सूखने वाले आँसू” स्थायी भावनात्मक अवस्था का संकेत हैं। यह क्षणिक दुख नहीं, बल्कि ऐसा अनुभव है जो समय के साथ भी बना रहता है।
दार्शनिक दृष्टिकोण
अनंत भावनाएँ
कुछ भावनाएँ समय से परे होती हैं। वे जीवन का चरण नहीं, जीवन की संरचना बन जाती हैं।
दर्द कमजोरी नहीं, गहराई है
कविता दर्द को नकारती नहीं, बल्कि उसे मानवीय चेतना का हिस्सा मानती है।
डूबकर भी तृष्णा का न मिटना
यह मनुष्य की अनंत खोज का प्रतीक है—प्रेम, अर्थ और सत्य की खोज।
समाधान से अधिक स्वीकार
कविता उत्तर नहीं देती, बल्कि स्वीकार करना सिखाती है।
कविता का मूल संदेश है—
👉 हर चीज़ का अंत होना ज़रूरी नहीं, कुछ चीज़ों का गहरा होना ही पर्याप्त है।
ब्लॉग
क्या तुम वही समुंदर हो, जिसका कोई किनारा नहीं? — अंतहीन भावनाओं पर एक विचार
भूमिका
कुछ भावनाएँ आती हैं और चली जाती हैं।
लेकिन कुछ भावनाएँ ठहर जाती हैं—गहराई में, चुपचाप, लगातार।
वे समय के साथ खत्म नहीं होतीं, न ही साधारण आँसुओं की तरह सूख जाती हैं। वे एक ऐसे समुंदर की तरह होती हैं, जिसका कोई किनारा नहीं।
यह लेख उन्हीं भावनाओं को समझने का एक प्रयास है।
समुंदर: मनुष्य के अंतरमन का प्रतीक
साहित्य और दर्शन में समुंदर हमेशा से रहस्य, अनंतता और चेतना का प्रतीक रहा है। जब किसी भावना को “किनारों के बिना समुंदर” कहा जाता है, तो इसका अर्थ है—वह नियंत्रण से बाहर है, माप से बाहर है।
ऐसी भावनाएँ हो सकती हैं:
शर्तों से मुक्त प्रेम
समय से परे शोक
बिना नाम की चाह
उत्तरों के बिना प्रश्न
ये समस्याएँ नहीं, अस्तित्व हैं।
कुछ आँसू क्यों नहीं सूखते
समाज हमें सिखाता है—रो लो और आगे बढ़ जाओ।
लेकिन सच यह है कि हर आँसू का अंत नहीं होता।
मनोवैज्ञानिक रूप से, लगातार बहती भावनाएँ उत्पन्न हो सकती हैं:
गहरी संवेदनशीलता से
अधूरे अर्थबोध से
अत्यधिक सहानुभूति से
जीवन से जुड़े प्रश्नों से
कविता इन आँसुओं को रोकती नहीं, उन्हें सम्मान देती है।
गहराई का डर और सुकून
गहराई डराती है क्योंकि वहाँ निश्चितता नहीं होती।
लेकिन वही गहराई सच्ची भी होती है।
ऊपरी खुशियाँ समझाई जा सकती हैं।
गहरी भावनाएँ केवल महसूस की जाती हैं।
तटहीन समुंदर सिखाता है—
हर चीज़ को अंत की ज़रूरत नहीं।
डूबते हुए भी टिके रहना
कविता का एक शक्तिशाली विचार है—डूबते हुए भी अस्तित्व बनाए रखना।
यह दर्शाता है:
सवालों के साथ जीना
अनिश्चितता में प्रेम करना
पीड़ा में भी टूटे बिना रहना
यह सहनशीलता शोर नहीं मचाती, पर गहरी होती है।
अंत न होने पर भी अर्थ
हर दर्शन समाधान नहीं देता।
कुछ दर्शन केवल साथ देते हैं।
हर भावना को किनारा नहीं चाहिए।
कुछ समुंदर गहरे होने के लिए ही होते हैं।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
यह कविता और ब्लॉग केवल साहित्यिक, भावनात्मक और दार्शनिक चिंतन के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, मानसिक स्वास्थ्य या पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है। यदि लंबे समय तक भावनात्मक पीड़ा दैनिक जीवन को प्रभावित करे, तो किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना आवश्यक है।
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