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अंतिम निष्कर्ष: जब दुनिया अब मेरी नहीं रहीदेश खोना किसी एक दिन की घटना नहीं है—यह धीरे-धीरे खुलने वाली एक लंबी प्रक्रिया है।जो दूसरों की नज़र में शायद दिखाई भी न दे,वह वर्षों तक भीतर जमा होता रहता है।यह केवल ज़मीन या नागरिकता का नुकसान नहीं,बल्कि बिना स्पष्टीकरण के जी पाने की सहजता का अंत है।फिर भी, यह क्षति मानव कथा का अंत नहीं है।जब दुनिया हमारी नहीं रहती,तब एक कठोर लेकिन ईमानदार चेतना जन्म लेती है।निश्चितता टूट जाती है,पर संवेदनशीलता तेज़ हो जाती है।विशेषाधिकार मिट जाते हैं,

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अंतिम निष्कर्ष: जब दुनिया अब मेरी नहीं रही देश खोना किसी एक दिन की घटना नहीं है— यह धीरे-धीरे खुलने वाली एक लंबी प्रक्रिया है। जो दूसरों की नज़र में शायद दिखाई भी न दे, वह वर्षों तक भीतर जमा होता रहता है। यह केवल ज़मीन या नागरिकता का नुकसान नहीं, बल्कि बिना स्पष्टीकरण के जी पाने की सहजता का अंत है। फिर भी, यह क्षति मानव कथा का अंत नहीं है। जब दुनिया हमारी नहीं रहती, तब एक कठोर लेकिन ईमानदार चेतना जन्म लेती है। निश्चितता टूट जाती है, पर संवेदनशीलता तेज़ हो जाती है। विशेषाधिकार मिट जाते हैं, पर गरिमा अपने पैरों पर खड़ी होना सीखती है। पहचान अब दी हुई चीज़ नहीं रहती— वह सहनशीलता और संघर्ष से गढ़ी जाती है। देश खोने वाले लोग ऐसे सत्य जान लेते हैं जिनका सामना दूसरों को शायद कभी न करना पड़े— अपनापन कितना नाज़ुक होता है स्वीकृति कितनी शक्तिशाली होती है वैधता के बिना भी मानवता कैसे जीवित रहती है ये सच्चाइयाँ पीड़ादायक हैं, पर दृष्टि को साफ़ भी करती हैं। इस क्षति का अंतिम पाठ निराशा नहीं— उत्तरदायित्व है। स्मृति को सँभालने का उत्तरदायित्व, पर उसे ज़हर न बनने देने का भी। बोलने का उत्तर...