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हम अपनी ही प्यास से ज़िंदा हैंस्वाभिमान, आत्मनिर्भरता और नीरव शक्ति का दर्शनभूमिका (Introduction)हर इंसान को जीवन में कभी-न-कभी ऐसे मोड़ पर आना पड़ता हैजहाँ आँसू मदद नहीं करतेऔर सहारा बोझ लगने लगता है।उस समय इंसान या तो टूट जाता हैया फिर अपने भीतर कुछ ऐसा खोज लेता हैजो उसे बिना किसी सहारे के भी खड़ा रखता है।“हम अपनी ही प्यास से ज़िंदा हैं”

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हम अपनी ही प्यास से ज़िंदा हैं स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता और नीरव शक्ति का दर्शन भूमिका (Introduction) हर इंसान को जीवन में कभी-न-कभी ऐसे मोड़ पर आना पड़ता है जहाँ आँसू मदद नहीं करते और सहारा बोझ लगने लगता है। उस समय इंसान या तो टूट जाता है या फिर अपने भीतर कुछ ऐसा खोज लेता है जो उसे बिना किसी सहारे के भी खड़ा रखता है। “हम अपनी ही प्यास से ज़िंदा हैं” इसी खोज का वाक्य है। यह वाक्य न शिकायत है, न घमंड— यह जीवन को जैसे-का-तैसा स्वीकार करने की घोषणा है। दया और स्वाभिमान के बीच की रेखा हर मदद अच्छी नहीं होती। हर करुणा राहत नहीं देती। कुछ दया ऐसी होती है जो इंसान को बचाने के नाम पर उसे कमजोर बना देती है। इस कविता का भाव साफ़ है— मुझे तुम्हारी दया नहीं चाहिए, क्योंकि मैंने खुद को संभालना सीख लिया है। स्वाभिमान वह शक्ति है जो बिना आवाज़ किए इंसान को जीवित रखती है। अपनी प्यास से जीना क्या होता है? अपनी प्यास से जीने का मतलब है— बिना शिकायत आगे बढ़ना बिना तालियों के मजबूत होना बिना सहारे के संतुलन बनाए रखना यह कोई आसान रास्ता नहीं है। लेकिन यह रास्ता इंसान को खुद का सहारा बनना सिखाता ह...