प्रतीक्षा और आत्म-मूल्य, उदासीनता की पीड़ा, पहचान और ख़ामोशी, आधुनिक रिश्ते, दार्शनिक कविताहैशटैग#प्रतीक्षा#ख़ामोशी#आत्मपहचान#उपेक्षा#आधुनिकरिश्ते#दार्शनिकलेखनमेटा टाइटलप्रतीक्षा, ख़ामोशी और आत्म-पहचान का संकटमेटा डिस्क्रिप्शनप्रतीक्षा और उपेक्षा के बीच खोते हुए अस्तित्व पर आधारित एक दार्शनिक कविता और विचारात्मक ब्लॉग।अगर आप चाहें तो अगले चरण में मैं कर सकता हूँ
प्रतीक्षा और प्रस्थान के बीच की ख़ामोशी कविता सुबह से बैठा था तेरी प्रतीक्षा में, लिखे शब्दों से शाम ढल गई। तू आया बस एक पलक भर, और पलक झपकते ही दूर चला गया। क्या यही थी मेरी पहचान? क्या यही था मेरा परिणाम? प्रतीक्षा की बेंच पर बैठा इंसान— क्या ख़ामोशी ही उसका नाम? कविता का विश्लेषण यह कविता शोर नहीं करती— यह धीरे-धीरे भीतर उतरती है। सुबह से शाम तक की प्रतीक्षा केवल समय का ब्योरा नहीं है, यह जीवन के लंबे इंतज़ार का प्रतीक है। कवि ने अपना दिन, अपनी उपस्थिति, अपनी भावना — सब समर्पित कर दिया। और उत्तर में मिला सिर्फ़ एक पल। यहाँ पीड़ा अस्वीकार की नहीं है, बल्कि अनदेखे रह जाने की है। अंत में उठे प्रश्न किसी उत्तर की माँग नहीं करते— वे आत्म-पहचान के टूटने का संकेत हैं। दार्शनिक दृष्टि 1. प्रतीक्षा जब पहचान बन जाए प्रतीक्षा को हम धैर्य और प्रेम मानते हैं, पर जब वह अनदेखी हो जाए, तो वह व्यक्ति को धीरे-धीरे स्वयं से काट देती है। 2. अस्तित्व और स्वीकृति मनुष्य केवल जीना नहीं चाहता— वह चाहता है कि कोई उसे देखे, समझे, माने। जब यह स्वीकृति नहीं मिलती, तो अस्तित्व भी प्रश्न बन जाता है। ...