मेटा विवरण (Meta Description)माँ और संतान के निःशब्द प्रेम, दूरी और त्याग पर आधारित एक गहरी भावनात्मक हिंदी कविता।🔑 कीवर्ड्स (Keywords)माँ पर कविता, हिंदी भावनात्मक कविता, माँ और बच्चे का रिश्ता, निःशब्द प्रेम, मातृत्व की भावना, पारिवारिक कविता, दार्शनिक कविता#️⃣ हैशटैग्स (Hashtags)#माँ#माँ_पर_कविता#हिंदी_कविता#भावनात्मक_कविता#माँ_और_संतान#निःशब्द_प्रेम#मातृत्व
माँ, तुम मुझे पास क्यों नहीं बुलाती? माँ, अब तुम मुझे पास क्यों नहीं बुलाती? इस घर की दीवारों में अब भी तुम्हारी साँसों की गर्माहट है, पर मेरा नाम तुम्हारे होंठों तक नहीं आता। तुम चुपचाप बैठी रहती हो, जैसे खामोशी ने तुम्हारी भाषा सीख ली हो। पास की खाली कुर्सी को देखकर तुम शिकायत नहीं करतीं, बस अकेले रहने की आदत ओढ़ लेती हो। माँ, क्या समय ने तुम्हें इतना मजबूत बना दिया, या जीवन ने किसी को न बुलाने का सबक सिखा दिया? कभी तुम्हारी गोद मेरी पूरी दुनिया थी। डर वहीं खत्म हो जाता था। आधी नींद में कही तुम्हारी दुआएँ मुझे सुरक्षित रखती थीं। आज मैं बड़ा हो गया हूँ, तुम्हारी चिंताओं से भी बड़ा, तुम्हारे इंतज़ार से भी आगे, फिर भी इतना छोटा हूँ कि अब भी तुम्हारी एक पुकार चाहिए। माँ, जब मैं यहीं हूँ, तो तुम अपने भीतर क्यों सिमट जाती हो? अपने दुखों को खामोशी की तहों में क्यों छुपा लेती हो? क्या प्यार का अर्थ धीरे-धीरे हाथ छोड़ देना है, ताकि बच्चा अकेले खड़ा होना सीख सके? अगर ऐसा ही है, तो मुझे माफ़ करना माँ— मैं अब भी सीख रहा हूँ कैसे दूर रहकर भी तुम्हें छोड़ा न जाए। कभी-कभी मन करता है कि ...