नीचे पूरा लेख एक साथ, क्रमबद्ध, साफ़ और ब्लॉग-रेडी रूप में दिया गया है—जिसे आप सीधे पोस्ट कर सकते हैं।दादा से पहले पिता की मृत्यु और पोते की विरासतक्या इस्लाम सच में पोते को दादा की संपत्ति से वंचित कर देता है?भूमिका (Introduction)ज़िंदगी में कुछ नुकसान ऐसे होते हैं जो इंसान को भीतर तक तोड़ देते हैं।एक बच्चा अपने पिता को खो देता है—और कुछ
नीचे पूरा लेख एक साथ, क्रमबद्ध, साफ़ और ब्लॉग-रेडी रूप में दिया गया है—जिसे आप सीधे पोस्ट कर सकते हैं। दादा से पहले पिता की मृत्यु और पोते की विरासत क्या इस्लाम सच में पोते को दादा की संपत्ति से वंचित कर देता है? भूमिका (Introduction) ज़िंदगी में कुछ नुकसान ऐसे होते हैं जो इंसान को भीतर तक तोड़ देते हैं। एक बच्चा अपने पिता को खो देता है—और कुछ वर्षों बाद, जब उसके दादा का देहांत होता है, तब उसे यह सुनने को मिलता है: “तुम्हें दादा की ज़मीन या संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं मिलेगा, क्योंकि तुम्हारे पिता दादा से पहले गुजर गए थे।” यह बात सिर्फ़ क़ानूनी नहीं लगती—यह भावनात्मक रूप से भी अन्यायपूर्ण लगती है। यहीं से सवाल उठता है: क्या यह नियम सच में इस्लाम में मौजूद है? और अगर है, तो क्या यह इस्लामी न्याय और इंसानियत के खिलाफ़ नहीं जाता? इस लेख में हम इस सवाल को क़ानून, क़ुरआन, फ़िक़्ह, नैतिकता और आधुनिक संदर्भ—सबके साथ समझेंगे। मूल नियम क्या है? क्लासिकल सुन्नी इस्लामी विरासत क़ानून के अनुसार: यदि पिता की मृत्यु दादा से पहले हो जाती है, तो पोता/पोती दादा की संपत्ति का स्वचालित वारिस ...