पद ऊँचा हुआ, स्मृति नीचे गिर गई — भाग 2“मैंने सब कुछ खुद किया” — यह सबसे बड़ा भ्रमसफलता के साथ मनुष्य के भीतर एक खतरनाक भ्रम जन्म लेता है—कि वह स्वयं ही सब कुछ बन गया है।धीरे-धीरे वह भूलने लगता है—किसने सबसे पहले उस पर विश्वास कियाकिसने अवसर दियाकिसने तब साथ दिया जब कुछ भी तय नहीं थायह भूल आत्मविश्वास नहीं है।यह इतिहास से पलायन है।सच्चाई यह है किp
पद ऊँचा हुआ, स्मृति नीचे गिर गई — भाग 2 “मैंने सब कुछ खुद किया” — यह सबसे बड़ा भ्रम सफलता के साथ मनुष्य के भीतर एक खतरनाक भ्रम जन्म लेता है— कि वह स्वयं ही सब कुछ बन गया है। धीरे-धीरे वह भूलने लगता है— किसने सबसे पहले उस पर विश्वास किया किसने अवसर दिया किसने तब साथ दिया जब कुछ भी तय नहीं था यह भूल आत्मविश्वास नहीं है। यह इतिहास से पलायन है। सच्चाई यह है कि कोई भी व्यक्ति अकेले नहीं बनता। हर सफलता के पीछे होते हैं— लोग, परिस्थितियाँ, समय, और अदृश्य सहायता। इन सबको नकारना अपने ही जीवन-कथ्य को झूठा बना देना है। अतीत अचानक “अनावश्यक” क्यों लगने लगता है? अतीत तीन असहज सच्चाइयाँ याद दिलाता है— कभी तुम असहाय थे तुम दूसरों पर निर्भर थे तुम्हें सहारे की ज़रूरत थी सत्ता और पद इन सच्चाइयों से असहज होते हैं। क्योंकि पद चाहता है— कठोर छवि प्रश्नहीन अधिकार अडिग भाषा अतीत इस बनावट को तोड़ देता है। इसलिए उसे दूर धकेल दिया जाता है। दूरी का मनोविज्ञान जैसे-जैसे पद बढ़ता है, वैसे-वैसे दूरी भी बढ़ती है— बातचीत में दूरी व्यवहार में दूरी भावनाओं में दूरी भाषा बदल जाती है— पहले: “हमने कोशिश की” अ...