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मेटा विवरणमानव अति, संयम की कमी और आग के प्रतीक के माध्यम से जीवन के संतुलन पर आधारित एक दार्शनिक कविता और ब्लॉग।कीवर्डदार्शनिक कविता, आग का प्रतीक, मानव स्वभाव, शक्ति और संयम, सीमा और जिम्मेदारी, जीवन दर्शनहैशटैग#दार्शनिककविता#मानवस्वभाव#संयम#आगकाप्रतीक#जीवनदर्शन#विचार

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जब थोड़ी-सी आग भी राख बन जाए कविता मैंने थोड़ा-सा ही खोला था, बस धुआँ बाहर जाने के लिए, ताकि हल्की-सी आग जले और कुछ पक सके जीने के लिए। न जलाने के इरादे से, न सब कुछ मिटाने के लिए— सिर्फ़ ज़रूरत भर, सिर्फ़ जीवन चलाने के लिए। पर तुमने सीमा नहीं समझी, न मौन संकेत पहचाने, आग में इतना ईंधन डाला कि अंत में सब राख रह जाने। जो आग पेट भर सकती थी, वो भूख का अंतिम निशान बनी। तुमने आग नहीं जलाई, तुमने आग की वजह जला दी। विश्लेषण और दर्शन यह कविता आग के बारे में नहीं है। यह कविता मानव अति और सीमा न समझ पाने के बारे में है। आग यहाँ प्रतीक है— शक्ति इच्छा प्रेम स्वतंत्रता ज़िम्मेदारी कवि ने केवल थोड़ी-सी अनुमति दी थी—धुआँ निकलने देने की। लेकिन उसी अनुमति को संपूर्ण अधिकार मान लेना ही मानवीय त्रासदी है। दार्शनिक बिंदु नियत बनाम परिणाम अच्छी नियत भी विनाश बन सकती है, यदि विवेक न हो। अति मनुष्य की कमजोरी है “पर्याप्त” शब्द मनुष्य को कठिन लगता है। शक्ति मिलते ही रुक न पाना आग नियंत्रण से बाहर जाए तो सब कुछ जला देती है। अनुमति की नैतिकता करने की छूट का अर्थ यह नहीं कि सीमा टूटे। कविता एक प्रश्...