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भाग–1: साँझ को खिड़की के किनारे पक्षी क्यों गाते हैं?(अनुभूति, स्मृति और नीरवता की शुरुआत)साँझ कोई साधारण समय नहीं होती।यह न पूरी तरह दिन होती है, न पूरी तरह रात।साँझ एक मौन विराम है—जहाँ रोशनी धीरे-धीरे पीछे हटती है और मन अनायास ही अपने भीतर झाँकने लगता है।ठीक इसी समय, कई बार, खिड़की के किनारे बैठा एक पक्षी गाना शुरू कर देता है।क्यों?इस प्रश्न का उत्तर विज्ञान दे सकता है,लेकिन भावना का उत्तर केवल अनुभूति में मिलता

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भाग–1: साँझ को खिड़की के किनारे पक्षी क्यों गाते हैं? (अनुभूति, स्मृति और नीरवता की शुरुआत) साँझ कोई साधारण समय नहीं होती। यह न पूरी तरह दिन होती है, न पूरी तरह रात। साँझ एक मौन विराम है—जहाँ रोशनी धीरे-धीरे पीछे हटती है और मन अनायास ही अपने भीतर झाँकने लगता है। ठीक इसी समय, कई बार, खिड़की के किनारे बैठा एक पक्षी गाना शुरू कर देता है। क्यों? इस प्रश्न का उत्तर विज्ञान दे सकता है, लेकिन भावना का उत्तर केवल अनुभूति में मिलता है। 🌆 साँझ का मन: जब शोर घटता है, संवेदना बढ़ती है दिन भर मन व्यस्त रहता है— काम, ज़िम्मेदारियाँ, गणनाएँ, चिंताएँ। पर जैसे ही साँझ उतरती है, उस व्यस्तता की गति धीमी पड़ जाती है। मन अब लड़ता नहीं, वह सुनने लगता है। इसी सुनने की अवस्था में पक्षी का गीत भीतर उतरता है। दोपहर में जो ध्वनि साधारण थी, साँझ में वही गहरी लगने लगती है। क्योंकि ध्वनि नहीं बदली— श्रोता बदल गया। 🪟 खिड़की: भीतर और बाहर के बीच की रेखा खिड़की केवल काँच और लकड़ी नहीं होती। खिड़की होती है— भीतर के जीवन और बाहर की दुनिया का संबंध सुरक्षा के भीतर से दूरी को महसूस करने का स्थान बिना शामिल ह...