सफलता: इनाम नहीं, एक परीक्षासफलता को अक्सर इनाम समझ लिया जाता है।पर सच यह है कि सफलता एक परीक्षा है।यह परीक्षा जाँचती है—चरित्रस्मृतिकृतज्ञतामानवतासफलता यह नहीं पूछती— “तुम कितने ऊपर पहुँचे?”वह पूछती है— “ऊपर पहुँचते-पहुँचते तुम क्या बन गए?”तालियों के बाद जो शेष रहता हैतालियाँ थम जाती हैं।पद समाप्त हो जाते हैं।सम्मान बदल जाता है।
सफलता: इनाम नहीं, एक परीक्षा सफलता को अक्सर इनाम समझ लिया जाता है। पर सच यह है कि सफलता एक परीक्षा है। यह परीक्षा जाँचती है— चरित्र स्मृति कृतज्ञता मानवता सफलता यह नहीं पूछती— “तुम कितने ऊपर पहुँचे?” वह पूछती है— “ऊपर पहुँचते-पहुँचते तुम क्या बन गए?” तालियों के बाद जो शेष रहता है तालियाँ थम जाती हैं। पद समाप्त हो जाते हैं। सम्मान बदल जाता है। पर अंत में जो बचता है— तुम कैसे इंसान थे तुमने किसे याद रखा तुमने किसे नहीं छोड़ा अंततः स्मृति ही पहचान बनती है। भूलने की कीमत अतीत भूलने की कीमत बहुत शांत होती है— रिश्ते सूख जाते हैं विश्वास टूट जाता है सहानुभूति कम हो जाती है अकेलापन बढ़ जाता है सम्मान तो मिलता है, पर अपनापन खो जाता है। याद रखने का पुरस्कार अतीत को याद रखने का पुरस्कार अलग है— मानसिक स्थिरता नैतिक स्पष्टता गहरे संबंध आंतरिक शांति स्मृति मनुष्य को तोड़ती नहीं, स्मृति मनुष्य को थामे रखती है। पाठक से सीधी बात यदि आप ऊपर उठ रहे हैं, या उठने की इच्छा रखते हैं— तो एक पल ठहरिए। खुद से पूछिए— क्या मैं आज भी अपने पुराने रूप को पहचानता हूँ? क्या मैं उन लोगों को सम्मान देता हू...