डिस्क्लेमर (Disclaimer)यह लेख एक साहित्यिक एवं दार्शनिक चिंतन है।यह किसी प्रकार की चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक सलाह या सामाजिक निर्देश नहीं है।पाठक इसे आत्म-मनन के रूप में ग्रहण करें।🔜 अगले भाग (भाग 3) में होगा:निःशर्त प्रेम क्यों भयमुक्त होता हैआत्मसम्मान बनाम अहंकारअकेलेपन का आध्यात्मिक अर्थअनदेखे पक्षी का आंतरिक जागरण
✨ हिंदी ब्लॉग – भाग 2 निःशर्त प्रेम बनाम समाज की शर्तें 1. समाज प्रेम को सौदे में क्यों बदल देता है? समाज प्रेम को बहुत जल्दी गणना में बदल देता है। यह पूछता है— तुम्हारे पास क्या है? तुम क्या दे सकते हो? तुम किस स्तर तक पहुँचोगे? यहीं से प्रेम एक सौदा बन जाता है। देने–लेने का हिसाब, लाभ–हानि की सूची। अनदेखा पक्षी इस सौदे में फिट नहीं बैठता, क्योंकि उसके पास देने को सिर्फ़ उसका होना है। 2. शर्तों वाला प्रेम क्यों अस्थिर होता है? जहाँ शर्त होती है, वहाँ डर होता है। डर कि— अगर मैं हार गया तो? अगर मैं बदल न पाया तो? अगर मैं कमज़ोर निकला तो? शर्तों वाला प्रेम हमेशा असुरक्षित रहता है, क्योंकि वह टिकता नहीं— वह परखा जाता है। निःशर्त प्रेम परखता नहीं, वह ठहरता है। 3. अनदेखे लोग गहरे क्यों होते हैं? जो लोग हमेशा देखे जाते हैं, वे सतह पर जीना सीखते हैं। लेकिन जो अनदेखे होते हैं— वे भीतर उतरते हैं। वे चुप्पी समझते हैं वे दर्द पढ़ते हैं वे मौन की भाषा जानते हैं अनदेखा पक्षी शोर से नहीं, गहराई से परिचित है। यही गहराई उसे प्रेम को समझने योग्य बनाती है। 4. “मुझमें प्रेम योग्य क्या है?”—यह...