दस्तावेज़ों से परे सत्य: स्मृति, विश्वास और मौन इतिहास(Hindi Blog – Part 3 / Final)विश्वास, तर्क और उनके बीच की मानवीय जगहमनुष्य का ज्ञान केवल तथ्यों या केवल विश्वास से नहीं बनता। वह दोनों के बीच की जगह में आकार लेता है। तर्क प्रमाण माँगता है, जबकि विश्वास अर्थ देता है। जब प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, तब भी अर्थ समाप्त नहीं हो जाता।
दस्तावेज़ों से परे सत्य: स्मृति, विश्वास और मौन इतिहास (Hindi Blog – Part 3 / Final) विश्वास, तर्क और उनके बीच की मानवीय जगह मनुष्य का ज्ञान केवल तथ्यों या केवल विश्वास से नहीं बनता। वह दोनों के बीच की जगह में आकार लेता है। तर्क प्रमाण माँगता है, जबकि विश्वास अर्थ देता है। जब प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, तब भी अर्थ समाप्त नहीं हो जाता। अमीरुद्दीन मुंशी को लेखक और स्वतंत्रता सेनानी मानना तर्क का विरोध नहीं है। यह इस सच्चाई को स्वीकार करना है कि हर संघर्ष दर्ज नहीं होता और हर साहस सुरक्षित नहीं रहता। इसी तरह, करबला से जुड़ा यह विश्वास कि विभिन्न धर्मों के लोग इमाम हुसैन के साथ खड़े होना चाहते थे, इतिहास की किताबों में भले न मिले—लेकिन मानव विवेक में उसकी जगह है। दस्तावेज़ों में न होना, अस्तित्व का निषेध नहीं समाज अक्सर वही याद रखता है जिसे काग़ज़ों में बाँधा जा सके। लेकिन क्या जिनका जीवन दर्ज नहीं हुआ, वे कम वास्तविक थे? अमीरुद्दीन मुंशी जैसे लोग इतिहास के पन्नों में नहीं, समाज की नींव में मौजूद होते हैं। वे मंच पर नहीं थे, लेकिन आधार में थे। वे प्रचार में नहीं थे, लेकिन परिवर्तन...