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एक गहरी, साहित्यिक, भावनात्मक और दार्शनिक स्मृतिकथा,जहाँ डर चिल्लाता नहीं, बस खड़ा रहता है।यह न तो भूत की पुष्टि है, न इनकार — यह मानव मन, स्मृति और नीरवता की कथा है।🌿 नीची सड़क की वह शामजिस दिन डर ने कुछ नहीं कहा, बस खड़ा रहा1. कुछ शामें समाप्त नहीं होतींकुछ शामें रात के साथ समाप्त नहीं होतीं।वे अधूरी रह जाती हैं—

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एक गहरी, साहित्यिक, भावनात्मक और दार्शनिक स्मृतिकथा, जहाँ डर चिल्लाता नहीं, बस खड़ा रहता है। यह न तो भूत की पुष्टि है, न इनकार — यह मानव मन, स्मृति और नीरवता की कथा है। 🌿 नीची सड़क की वह शाम जिस दिन डर ने कुछ नहीं कहा, बस खड़ा रहा 1. कुछ शामें समाप्त नहीं होतीं कुछ शामें रात के साथ समाप्त नहीं होतीं। वे अधूरी रह जाती हैं— मन में अटकी हुई एक पंक्ति की तरह। यह स्मृति भी वैसी ही है। यह डर से शुरू नहीं हुई थी। यह शुरू हुई थी बिल्कुल साधारण जीवन से— और शायद इसी कारण यह अब तक साथ है। खाने की तैयारी थी। परिचित चेहरे थे। और वह सहज भरोसा था जो किसी जानी-पहचानी जगह पर खड़े होने से आता है। कुछ भी यह संकेत नहीं दे रहा था कि यह शाम एक दिन स्मृति बन जाएगी। 2. वह रास्ता जो स्वयं नीचा था वह सड़क बाकी सड़कों जैसी नहीं थी। वह दोनों ओर की ज़मीन से काफ़ी नीची थी— मानो उसने ऊँचाई नहीं, नीरवता चुनी हो। एक ओर आम का बाग़ था— पेड़ों में भरी हुई ख़ामोशी। दूसरी ओर घरों की एक कतार— न डराने वाली, न ताकने वाली, बस मौजूद। उस रास्ते पर चलते समय हमेशा ऊपर की ओर देखना पड़ता था। तब इसका कोई अर्थ नहीं था। बा...