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भाग–4: आधुनिक जीवन, शहरी अकेलापन और क्यों ये क्षण आज और भी ज़रूरी हैंआज की दुनिया रुकती नहीं।दिन ढल जाता है, पर शोर नहीं ढलता।रोशनी बुझती है, पर मन ऑन रहता है।इसी लगातार चलने के बीच,साँझ को खिड़की के किनारे गाता हुआ पक्षीएक मौन विराम बनकर उभरता है।🏙️ 1. शहरी जीवन और खोती हुई प्राकृतिक लयकभी साँझ का मतलब था—काम का समापन,शरीर का विश्राम,मन का धीमा होना।

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भाग–4: आधुनिक जीवन, शहरी अकेलापन और क्यों ये क्षण आज और भी ज़रूरी हैं आज की दुनिया रुकती नहीं। दिन ढल जाता है, पर शोर नहीं ढलता। रोशनी बुझती है, पर मन ऑन रहता है। इसी लगातार चलने के बीच, साँझ को खिड़की के किनारे गाता हुआ पक्षी एक मौन विराम बनकर उभरता है। 🏙️ 1. शहरी जीवन और खोती हुई प्राकृतिक लय कभी साँझ का मतलब था— काम का समापन, शरीर का विश्राम, मन का धीमा होना। आज शहरों में— कृत्रिम रोशनी रात को भी दिन बना देती है काम की सीमा धुंधली हो गई है मन हमेशा “तैयार” रहता है इस लयहीनता में थकान बढ़ती है, पर कारण समझ नहीं आता। साँझ का पक्षी-गीत उसी खोई हुई लय की एक हल्की याद है। 😶‍🌫️ 2. जुड़े रहकर भी अकेले हम हर पल जुड़े हैं— कॉल, संदेश, स्क्रीन, सूचनाएँ। फिर भी साँझ को खिड़की के पास खड़े होकर अकेलापन महसूस होता है। क्यों? क्योंकि आधुनिक शोर उपस्थिति नहीं देता। पक्षी का गीत अलग है— वह जवाब नहीं माँगता वह तुलना नहीं करता वह प्रदर्शन नहीं चाहता वह केवल साथ देता है—बिना शर्त। 🪟 3. खिड़की के पास ठहरना: भीतर की ओर वापसी शहर की खिड़कियाँ अक्सर खुलती हैं— दूसरी इमारतों की दीवारों पर, व...