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जो अफ़वाह है, वह घटना नहीं होती—लेकिन जो अफ़वाह बन जाती है, वह बिल्कुल खाली भी नहीं होती”**कर्बला, हुसैनी ब्राह्मण और इतिहास व श्रद्धा की सीमा“जो अफ़वाह है, वह घटना नहीं होती,लेकिन जो अफ़वाह बन जाती है, वह कुछ तो होती है।”यह कहावत इतिहास को समझने की परिपक्वता सिखाती है।क्योंकि इतिहास केवल तारीख़ों और दस्तावेज़ों से नहीं बनता—

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**“जो अफ़वाह है, वह घटना नहीं होती— लेकिन जो अफ़वाह बन जाती है, वह बिल्कुल खाली भी नहीं होती”** कर्बला, हुसैनी ब्राह्मण और इतिहास व श्रद्धा की सीमा “जो अफ़वाह है, वह घटना नहीं होती, लेकिन जो अफ़वाह बन जाती है, वह कुछ तो होती है।” यह कहावत इतिहास को समझने की परिपक्वता सिखाती है। क्योंकि इतिहास केवल तारीख़ों और दस्तावेज़ों से नहीं बनता— वह स्मृति, भावना, श्रद्धा और दोहराव से भी आकार लेता है। कभी ये तत्व सत्य को उजागर करते हैं, और कभी उसे इतना बढ़ा देते हैं कि वास्तविकता धुंधली हो जाती है। “कर्बला की जंग में 30,000 ब्राह्मण इमाम हुसैन के साथ थे”— यह दावा भी इसी धुंधले क्षेत्र में आता है। क्या यह सच है? क्या यह पूरी तरह झूठ है? या फिर—जैसा कहावत कहती है— घटना नहीं, लेकिन बिल्कुल खाली भी नहीं? यह लेख टकराव के लिए नहीं, स्पष्टता के लिए लिखा गया है। कर्बला: एक ऐतिहासिक सत्य, कोई मिथक नहीं Imam Husain कर्बला की घटना 680 ईस्वी में हुई। यह कोई विशाल युद्ध नहीं था— यह नैतिक प्रतिरोध था। एक ओर थे इमाम हुसैन— पैग़म्बर मुहम्मद के नवासे— जिनके साथ थे लगभग 72 साथी: परिवार के लोग और करीबी अ...