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हैशटैग्स#हिन्दीकविता#आधुनिकअकेलापन#ख़ामोशीका डर#दार्शनिकलेखन#मानवीयरिश्ते#डिजिटलयुगमेटा डिस्क्रिप्शनडिजिटल युग में डर, ख़ामोशी और पहचान पर आधारित एक गहरी हिन्दी कविता और दार्शनिक ब्लॉग।

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वह सर्वनाम जो मैं रख नहीं पाया कविता मोबाइल खोलते ही डर-सा लगता है, जैसे तुम अब भी कहीं यहीं रहते हो। अगर तुम फिर लौट आओ, प्रिय, तो क्या ख़ामोशी टूटेगी या और गहरी होगी? पूरी रात बस बैठा ही रहा, भोर ने आकर मेरा नाम लिया। वक़्त जैसे थम गया ख़ामोशी में, रात बूढ़ी हुई, पर मैं जगा रहा। तुम्हारी जगह जो रख दिया, वह सर्वनाम खुद से बिछड़ गया। “मैं”, या “तुम”, या कुछ और— अर्थ खो गया, बची बस एक छोर। स्क्रीन चमकती, मन असमंजस में, हाज़िरी सच है या ग़ैरहाज़िरी भ्रम में? काँच को छूता हूँ, सुकून नहीं, बस सवाल—जो कभी ख़त्म नहीं। कविता का विश्लेषण यह कविता किसी घटना पर नहीं टिकी है, बल्कि ठहराव पर खड़ी है। 1. “मोबाइल खोलते ही डर-सा लगता है” यह डर मशीन का नहीं है। यह डर है—उम्मीद का। मोबाइल खोलते समय मन सोचता है: शायद कोई संदेश न हो शायद पुराना संदेश हो या फिर ऐसी ख़ामोशी, जो निजी लगती है यह मोबाइल स्मृति का दरवाज़ा बन जाता है। 2. रात और भोर कवि सो नहीं पाता क्योंकि शरीर नहीं, मन रुका हुआ है। रात बैठकर कट जाती है— कोई इंतज़ार है, पर कारण स्पष्ट नहीं। भोर फिर भी आ जाती है। यही जीवन का सच है— ज...