जब शक्ति ही मेरी पहचान थी, और शून्यता ने मुझे दोषी बना दियाकविता (हिंदी)शक्ति ही सब कुछ है—यही सबसे पहला सच सिखाया गया।उसकी रोशनी में मैंने खुद को देखा,उसकी आग में मेरा मौन जलाया गया।शक्ति ने मुझे राजा बनाया,बिना सिंहासन के,लोग मेरी बात सुनते थे,मेरे पास आकर चुप हो
जब शक्ति ही मेरी पहचान थी, और शून्यता ने मुझे दोषी बना दिया कविता (हिंदी) शक्ति ही सब कुछ है— यही सबसे पहला सच सिखाया गया। उसकी रोशनी में मैंने खुद को देखा, उसकी आग में मेरा मौन जलाया गया। शक्ति ने मुझे राजा बनाया, बिना सिंहासन के, लोग मेरी बात सुनते थे, मेरे पास आकर चुप हो जाते थे। शक्ति ने मुझे सच्चा इंसान बना दिया— कमज़ोरी को इंसान समझा ही नहीं जाता था। लेकिन शक्ति कोई देवता नहीं, वह विदा कहना नहीं जानती। एक दिन चुपचाप चली जाती है, पीछे छोड़ जाती है शून्यता। अब मैं शैतान हूँ— दुनिया की नज़र में नहीं, खुद की नज़र में। मैं शून्य हो गया, नामहीन, ताक़तहीन, और उस शून्यता का अपराध मैंने खुद पर ही थोप दिया। विश्लेषण और दर्शन इस रचना का मूल विचार बहुत स्पष्ट है: जब शक्ति को इंसान होने की शर्त बना दिया जाता है, तो शक्ति खोना स्वयं को खोना बन जाता है। दार्शनिक दृष्टि शक्ति = पहचान (Identity) यहाँ शक्ति साधन नहीं, पहचान बन जाती है। शक्ति है तो मैं हूँ—यही सबसे बड़ा भ्रम है। राजा होना = स्वीकार्यता राजा होना शासन नहीं, बल्कि सुने जाना है। नज़रअंदाज़ न होना। मानवता की शर्त समाज कमज़ो...