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हिंदी संस्करण (राजनीतिक विश्लेषण ब्लॉग)शीर्षकमालदा की सभा में कम भीड़: क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन की असंभवता का संकेत है?भूमिकाभारतीय राजनीति में जनसभाएँ केवल भाषण मंच नहीं होतीं—वे शक्ति, प्रभाव और जनसमर्थन के प्रतीक मानी जाती हैं। जब देश के प्रधानमंत्री, विश्व स्तर पर सम्मानित नेता नरेंद्र मोदी किसी राज्य में खुली जनसभा करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से बड़ी भीड़ की उम्मीद की जाती है।लेकिन जब पश्चिम बंगाल के मालदा में आयोजित उनकी सभा में अपेक्षा से कम उपस्थिति दिखाई दी, तो एक

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 हिंदी संस्करण (राजनीतिक विश्लेषण ब्लॉग) शीर्षक मालदा की सभा में कम भीड़: क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन की असंभवता का संकेत है? भूमिका भारतीय राजनीति में जनसभाएँ केवल भाषण मंच नहीं होतीं—वे शक्ति, प्रभाव और जनसमर्थन के प्रतीक मानी जाती हैं। जब देश के प्रधानमंत्री, विश्व स्तर पर सम्मानित नेता नरेंद्र मोदी किसी राज्य में खुली जनसभा करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से बड़ी भीड़ की उम्मीद की जाती है। लेकिन जब पश्चिम बंगाल के मालदा में आयोजित उनकी सभा में अपेक्षा से कम उपस्थिति दिखाई दी, तो एक गंभीर राजनीतिक प्रश्न उठ खड़ा हुआ— क्या इसका मतलब यह है कि पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन लगभग असंभव है? क्या यह सत्तारूढ़ दल की अटूट पकड़ का संकेत है? यह लेख भावनाओं पर नहीं, बल्कि यथार्थ आधारित राजनीतिक विश्लेषण पर केंद्रित है। भारतीय राजनीति में भीड़ का प्रतीकात्मक अर्थ कई राज्यों में विशाल भीड़ को राजनीतिक लहर माना जाता है। लेकिन बंगाल की राजनीति अलग प्रकृति की है। यहाँ— जनसभा में न आना, मतदान न करने का संकेत नहीं “मौन मतदाता” बड़ी भूमिका निभाते ...