कविता (Hindi Version)शीर्षक: सांझ की आवाज़क्यों पुकारते हो तुम मुझे बस सांझ के किनारों पर,अधूरी धूप, अधूरी धड़कन, आधे उजाले की राहों पर?दरवाज़े पर ठिठक कर टूटती हवा की थकी आवाज़ें,कदमों की गूँज है, पर दिखती नहीं कोई परछाइयाँ पासें।तुम्हारी दया जैसे जंग खाई बूंदों की परछाईं,पुराने छल में ढली हुई, बीती यादों की रुलाई।क्या तुम वही हो—वादा जो आधा था, धड़कन जो अधूरी,किस्से जो अटके पड़े हैं, किसी दिल की टूटी दूरी?उस बरगद के आँगन में, जड़ों की अँधियारी में,दिन के परे, रात की दस्तक की तैयारी में;वहीं से तुमने एक साँस भेजी थी मेरी तरफ
🌫️ कविता (Hindi Version) शीर्षक: सांझ की आवाज़ क्यों पुकारते हो तुम मुझे बस सांझ के किनारों पर, अधूरी धूप, अधूरी धड़कन, आधे उजाले की राहों पर? दरवाज़े पर ठिठक कर टूटती हवा की थकी आवाज़ें, कदमों की गूँज है, पर दिखती नहीं कोई परछाइयाँ पासें। तुम्हारी दया जैसे जंग खाई बूंदों की परछाईं, पुराने छल में ढली हुई, बीती यादों की रुलाई। क्या तुम वही हो—वादा जो आधा था, धड़कन जो अधूरी, किस्से जो अटके पड़े हैं, किसी दिल की टूटी दूरी? उस बरगद के आँगन में, जड़ों की अँधियारी में, दिन के परे, रात की दस्तक की तैयारी में; वहीं से तुमने एक साँस भेजी थी मेरी तरफ, ना था कोई चेहरा—मगर डर उतरा था सर पे लटक। आज भी जब शाम ढले, और हवाएँ कुछ फुसफुसाएँ, दिल की गली में पुराने कदम जैसे फिर से आएँ; जानता हूँ—भूत नहीं, पर एहसास बहुत गहरा है, तुम हो कहीं—ये यक़ीन नहीं, पर मन को यकीं कह रहा है। तो पुकारो मुझे फिर, रात के किनारों पर कहीं, जहाँ तर्क और जज़्बात हार जाते हैं यहीं; सच की जीत हो जाए, फिर भी मान लेता हूँ— तेरी आवाज़ रहती है, भले तुम रहते नहीं। 🧠 कविता विश्लेषण (Hindi) यह कविता भूतों के अस्तित्व पर...