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हम अपनी ही प्यास से ज़िंदा हैंस्वाभिमान, नीरव शक्ति और आत्मनिर्भरता का जीवन-दर्शन🌑 कवितामुझे मत रुला तेरी आँखों से,हम तो ज़िंदा हैं अपनी प्यासों से।तेरी दया अगर सहारा होती,तो कब के डूब चुके होते।हमने सूखे से जीना सीखा है,बिना बादल के भी जलना सीखा है।तेरे आँसू उधार की राहत हैं,हमें दर्द से चलना आता है।

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हम अपनी ही प्यास से ज़िंदा हैं स्वाभिमान, नीरव शक्ति और आत्मनिर्भरता का जीवन-दर्शन 🌑 कविता मुझे मत रुला तेरी आँखों से, हम तो ज़िंदा हैं अपनी प्यासों से। तेरी दया अगर सहारा होती, तो कब के डूब चुके होते। हमने सूखे से जीना सीखा है, बिना बादल के भी जलना सीखा है। तेरे आँसू उधार की राहत हैं, हमें दर्द से चलना आता है। तू पूछता है— इतने अकेले कैसे खड़े हो? मैं मुस्कुरा कर कह देता हूँ— जहाँ स्वाभिमान ज़िंदा हो, वहाँ अकेलापन हार जाता है। 🧠 भावार्थ और दर्शन यह कविता आँसुओं के खिलाफ़ नहीं है, यह दया के नाम पर कमज़ोर बनाए जाने के खिलाफ़ है। “अपनी प्यास से ज़िंदा रहना” का अर्थ है— बिना शिकायत जीना, बिना सहारे संतुलन रखना, और बिना दिखावे मज़बूत होना। यह दर्शन सिखाता है कि हर मदद मुक्ति नहीं देती, और हर सहारा शक्ति नहीं बनता। कभी-कभी आत्मसम्मान ही सबसे बड़ा सहारा होता है। ✍️ ब्लॉग भूमिका जीवन में एक समय ऐसा आता है जब बाहरी सहारे कम पड़ जाते हैं और इंसान को अपने भीतर खुद का आधार बनाना पड़ता है। “हम अपनी ही प्यास से ज़िंदा हैं” उसी क्षण की भाषा है— न शिकायत, न घमंड— बस सच्चाई। दया और स्वाभ...