अध्याय 1: इंसान क़ियामत से क्यों नहीं डरता?ज़्यादातर लोग क़ियामत को एक दूर का दृश्य मानते हैं—किसी दिन आसमान फटेगा,न्याय की आवाज़ आएगी,अच्छे-बुरे का हिसाब होगा।यह सब सुनने में डरावना है,लेकिन दिल इसे दूर समझता है।ईश्वर दयालु हैं,माफ़ करते हैं,नीयत देखते हैं,कमज़ोरियों को समझते हैं।क़ियामत का डर “कल्पना” का डर है।लेकिन इंसान?इंसान का दर्द वास्तविक होता है।इंसान की शिकायत तुरंत चुभती है।इंसान की चोट दिल पर निशान छो
ठीक है।शुरू करते 🌑 शीर्षक: “सच का डर — शिकायत, आत्मा और इंसान के अंदर का न्याय” --- 🌿 मूल कविता (हिंदी संस्करण) “सच का भीतर वाला डर” मुझे न डर है उस अंतिम रात का, न स्वर्ग की आग, न न्याय-प्रभात का। पर दिल के भीतर कंपकंपी है— वे शिकायतें, जो अब भी बाकी हैं। सच आखिर है कहाँ छिपा? क्या शर्म की छाया में दबा? क्या दर्पण बस कठोर रूप है? या किसी की दुआ का स्वरूप है? अंत नहीं, मुझे डर है बस— अपने प्रियजनों की चुप पीड़ा का डस। अधूरे आँसू, अनकहा दर्द— आत्मा के भीतर जलती धध। तो बताओ सच क्या है आखिर? छाया? बोझ? कोई मौन लकीर? मैं खोज रहा हूँ खुद में, जहाँ— सच वही हूँ, जैसा हूँ मैं यहाँ। --- ⭐ भूमिका (ब्लॉग की शुरुआत) इंसान का डर दो तरह का होता है। एक डर आसमान की तरफ होता है — क़ियामत, ईश्वर का न्याय, परलोक की सज़ा… यह डर बड़ा है, विशाल है, लेकिन दूर है। दूसरा डर बहुत छोटा दिखता है, पर उसका असर बहुत गहरा होता है — शिकायत का डर। जिस शिकायत को किसी ने कहा नहीं, जिस दर्द को किसी ने जाहिर नहीं किया, जिस उम्मीद को हमने तोड़ा, जिस भरोसे को हम निभा नहीं पाए… वही शिकायतें इंसान को सबसे ज़...