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कीवर्ड्समाफ़ी नहीं दर्शन, आत्मरक्षा और पहचान, विश्वासघात मनोविज्ञान, आत्मस्वीकृति, अस्तित्ववादी लेखनहैशटैग#मैंमाफ़ीनहींमाँगता #आत्मस्वीकृति #दर्शन #भावनात्मकयथार्थ #अस्तित्ववाद #खुदकेलिएखड़ामेटा डिस्क्रिप्शनएक शक्तिशाली हिंदी कविता और दार्शनिक ब्लॉग जो माफ़ी से इनकार, आत्मरक्षा, विश्वासघात और आत्मस्वीकृति की गहरी पड़ताल करता है।l

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मैं माफ़ी नहीं माँगता—क्योंकि मुझे ऐसा ही बनाया गया मैं विश्वासघात के लिए शर्मिंदा नहीं, क्योंकि मुझे टूटन के बीच गढ़ा गया। मैं डाँटने के लिए माफ़ी नहीं माँगता, मेरी आवाज़ दबे हुए दर्द से निकली। मैं नफ़रत मिलने पर भी अफ़सोस नहीं करता, क्योंकि दुनिया ने मुझे इसी तरह बनाया। मैं आराम में नहीं पला, मेरी परवरिश सुरक्षित भरोसे में नहीं हुई। जहाँ भरोसा बार-बार टूटा, वहीं मैंने खुद को बचाना सीखा। अगर मेरी धार तेज़ है, तो याद रखना—मुझे कुंद होने नहीं दिया गया। मैं तूफ़ान बनना नहीं चाहता था, तूफ़ान ने मुझे चुन लिया। मैं ज़िंदा रहने के लिए शर्मिंदा नहीं, उस रूप के लिए भी नहीं जिसे तुम समझ न सके। यह कविता अहंकार की घोषणा नहीं है, बल्कि सच्चाई कहने का साहस है। यहाँ “मैं माफ़ी नहीं माँगता” कोई घमंड नहीं, बल्कि थकान और आत्मरक्षा की भाषा है। दर्शन की दृष्टि से यह लेख अस्तित्ववादी यथार्थवाद की बात करता है—मनुष्य हमेशा अपने आप को नहीं चुनता, अक्सर परिस्थितियाँ उसे गढ़ती हैं। बार-बार चोट मिलने पर विश्वास बदलता है, बार-बार चुप कराए जाने पर आवाज़ कठोर होती है, और लगातार अस्वीकार होने पर इंसान स...