*मैं खुद से क्यों बातें करता हूँ?अकेलापन, ज़िंदा रहना और भीतर का संवाद**मेटा डिस्क्रिप्शन (Meta Description)अकेलेपन और खुद से बात करने के मनोविज्ञान पर एक गहरी, मानवीय और दार्शनिक चर्चा। यह लेख दिखाता है कि यह पागलपन नहीं, बल्कि भावनात्मक अस्तित्व की रक्षा है।कीवर्ड्स (Keywords)अकेलापन, खुद से बातें करना, भावनात्मक दर्द, आंतरिक संवाद, मानसिक मजबूती, मानवीय अनुभव, चुप्पीहैशटैग (Hashtags)#अकेलापन#खुदसेबातें#मानसिकस्वास्थ्य#चुपदर्द#मानवीयअनुभव#अदृश्यलोग
ख़ुद से बातें: जब अकेलापन आवाज़ बन जाता है कविता मैं क्यों खुद से बातें करता हूँ मैं अकेले बातें करता हूँ भाई, पागलपन की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि मेरे शब्दों को और कहीं ठहरने की जगह नहीं मिलती। मेरे वाक्यों के अंत में कोई खड़ा नहीं होता, कोई यह नहीं कहता— “मैं सुन रहा हूँ, मैं यहाँ हूँ।” इसलिए हवा से बात करता हूँ, हवा धैर्य से सुन लेती है। अपने सवालों के जवाब मुझे खुद ही देने पड़ते हैं। अगर तुम मुझे अकेले बोलते देखो, तो डरना मत। मैं बस कोशिश कर रहा हूँ एक उपेक्षित दुनिया में खुद को ज़िंदा रखने की। विश्लेषण और दर्शन यह कविता केवल अकेलेपन की बात नहीं करती। यह उस दर्द की बात करती है जब इंसान अदृश्य हो जाता है। इंसान खुद से बातें तब शुरू करता है जब उसे बार-बार यह एहसास होता है— कि उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं है। दार्शनिक दृष्टि खुद से बातें करना कमजोरी नहीं है यह आत्म-रक्षा का एक तरीका है। जब बाहर कोई साक्षी नहीं रहता, इंसान खुद को ही साक्षी बना लेता है। अकेलापन लोगों की कमी नहीं है अकेलापन समझ की कमी है। भीड़ में खड़ा इंसान भी भीतर से पूरी तरह अकेला हो सकता है। ख़ामोश...