हिंदी संस्करण | भाग 4 (समापन)सत्य, श्रद्धा और स्मृति की ज़िम्मेदारीहर ऐतिहासिक चर्चा अंततः एक ही सवाल पर आकर रुकती है—हम इतिहास से क्या चाहते हैं?क्या हम चाहते हैं कि इतिहासहमें गर्व महसूस कराए,या यह कि वह हमें सही दिशा दिखाए?कर्बला और“30,000 ब्राह्मण इमाम हुसैन के साथ थे”जैसे दावों की चर्चा
हिंदी संस्करण | भाग 4 (समापन) सत्य, श्रद्धा और स्मृति की ज़िम्मेदारी हर ऐतिहासिक चर्चा अंततः एक ही सवाल पर आकर रुकती है— हम इतिहास से क्या चाहते हैं? क्या हम चाहते हैं कि इतिहास हमें गर्व महसूस कराए, या यह कि वह हमें सही दिशा दिखाए? कर्बला और “30,000 ब्राह्मण इमाम हुसैन के साथ थे” जैसे दावों की चर्चा हमें इसी सवाल से रू-बरू कराती है। कर्बला को बढ़ाने की ज़रूरत नहीं Imam Husain कर्बला इसलिए महान नहीं है कि वहाँ कितने लोग थे। कर्बला इसलिए महान है कि— इमाम हुसैन ने अन्याय को वैधता नहीं दी उन्होंने जीवन से ज़्यादा सत्य को चुना उन्होंने समझौता करने से इनकार किया उनकी यह “ना” इतिहास में गूंज बन गई। इस गूंज को काल्पनिक सेनाओं की ज़रूरत नहीं। श्रद्धा उपस्थिति से नहीं मापी जाती कई धर्मों और समुदायों के लोगों ने इमाम हुसैन के बलिदान को सम्मान दिया है। यह सम्मान— वास्तविक है ऐतिहासिक रूप से दिखाई देता है साहित्य और संस्कृति में मौजूद है लेकिन सम्मान का मतलब किसी युद्ध में मौजूद होना नहीं होता। कर्बला गिनती की नहीं, विवेक की विरासत है। वही कहावत—अंतिम बार, अंतिम अर्थ में अब एक बार फिर ...