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हम कहाँ आ गए, और कहाँ खो गए हम खुद को? आधुनिक जीवन में आत्म-विस्थापन, प्रकृति और खोती पहचान की कहानी --- भूमिका “हम कहाँ आ गए, और कहाँ खो गए हम खुद को? ये जंगल, ये पहाड़, ये नदियाँ— सब आज जैसे पराए हो गए हैं।” यह पंक्तियाँ केवल स्थान बदलने की बात नहीं करतीं, यह अस्तित्व के भटकाव की कथा कहती हैं। यह उस इंसान की आवाज़ है, जो सब कुछ पा लेने के बाद भी अपने भीतर कुछ खो चुका है। आज हमारे पास सब कुछ है— तकनीक, सुविधा, रफ्तार, पैसा— लेकिन फिर भी मन के किसी कोने में एक खालीपन ज़िंदा है। यह ब्लॉग उसी खालीपन की गहराई में उतरने का प्रयास है। --- 1. आज “पहुंच जाना” किसे कहते हैं? पहले “पहुंच जाना” का मतलब था— घर पहुँचना, मंज़िल पाना, अपनों के पास लौट आना। आज “पहुंच जाना” बन गया है— बड़ी नौकरी ज़्यादा पैसा ऊँचा पद महंगा घर सोशल मीडिया पर पहचान लेकिन सच्चाई यह है कि जितना ज़्यादा हम दुनिया में “आगे” बढ़ते हैं, उतना ही हम अपने भीतर पीछे छूटते जाते हैं। हम मंज़िल पर पहुँच जाते हैं, पर मन को कहीं रास्ते में खो देते हैं। --- 2. जब प्रकृति अजनबी लगने लगे कभी जंगल हमारी शरण थे, पहाड़ हमारी ताक़त...