लगभग… : सुने बिना छोड़ दिए जाने की पीड़ापार्ट 4 (आरोग्य, आत्मबोध और समापन)41. हर पीड़ा का उत्तर नहीं होताकुछ प्रश्न ऐसे होते हैंजिनका उत्तर नहीं,केवल स्वीकार होता है।यह लेख उत्तर देने की जल्दबाज़ी नहीं करता।यह बस कहता है—यह पीड़ा वास्तविक है।यह काल्पनिक नहीं।और यही स्वीकारआरोग्य की पहली सीढ़ी है।l
लगभग… : सुने बिना छोड़ दिए जाने की पीड़ा पार्ट 4 (आरोग्य, आत्मबोध और समापन) 41. हर पीड़ा का उत्तर नहीं होता कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका उत्तर नहीं, केवल स्वीकार होता है। यह लेख उत्तर देने की जल्दबाज़ी नहीं करता। यह बस कहता है— यह पीड़ा वास्तविक है। यह काल्पनिक नहीं। और यही स्वीकार आरोग्य की पहली सीढ़ी है। 42. समझना और क्षमा करना एक नहीं अक्सर कहा जाता है— “समझ लिया तो क्षमा कर दिया।” लेकिन यह ज़रूरी नहीं। समझना मतलब— घटना को अपने विरुद्ध हथियार न बनाना। यह कविता क्षमा की माँग नहीं करती। यह आत्म-दोष से मुक्ति देती है। 43. कुछ घाव भरते नहीं, बदल जाते हैं कुछ घाव कभी पूरी तरह बंद नहीं होते। लेकिन वे— संवेदनशीलता में बदल जाते हैं, ध्यान में बदल जाते हैं, मानवीय समझ में बदल जाते हैं। यह कविता उसी परिवर्तन की प्रक्रिया को मान्यता देती है। 44. मौन को नए अर्थ में देखना यहाँ मौन हार नहीं है। यह— एक सीमा है, एक चयन है, एक आत्म-रक्षा है। हर जगह बोलना ज़रूरी नहीं। हर जगह चुप रहना भी कायरता नहीं। 45. वक्ता की शांत प्रतिज्ञा इस अनुभव के बाद वक्ता बदलता है। वह— अब हर जगह नहीं खुलता, हर ...