ध्रुवीकरण के पार: क्यों बंगाल का चुनाव केवल गणित नहीं हैप्रस्तावनापश्चिम बंगाल की राजनीति को आज एक सरल फ़ॉर्मूले में बाँधने की कोशिश हो रही है—बंगाली हिंदुओं का ‘सनातन’ पहचान के तहत एकत्रीकरण,मुस्लिम मतदाताओं का विभाजन,और इस आधार पर निष्कर्ष कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) का हारना तय है।
ध्रुवीकरण के पार: क्यों बंगाल का चुनाव केवल गणित नहीं है प्रस्तावना पश्चिम बंगाल की राजनीति को आज एक सरल फ़ॉर्मूले में बाँधने की कोशिश हो रही है— बंगाली हिंदुओं का ‘सनातन’ पहचान के तहत एकत्रीकरण, मुस्लिम मतदाताओं का विभाजन, और इस आधार पर निष्कर्ष कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) का हारना तय है। यह तर्क संख्याओं में सही लग सकता है। लेकिन बंगाल का इतिहास बताता है कि यहाँ चुनाव केवल पहचान के जोड़-घटाव से तय नहीं होते। यहाँ निर्णायक भूमिका निभाते हैं— प्रशासनिक भरोसा, अस्थिरता का डर, सांस्कृतिक स्मृति और रोज़मर्रा की शांति। एक दृश्य जिसने कथा को रोक दिया ग्रामीण बंगाल में एक पदयात्रा दिखाई दी— मालदा के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, कालियाचक के थाना प्रभारी, सशस्त्र बल, छात्र और आम नागरिक Netaji Subhas Chandra Bose की तस्वीर लेकर साथ-साथ चलते हुए। कोई पार्टी झंडा नहीं। कोई नारा नहीं। कोई वोट की अपील नहीं। यह राजनीतिक लामबंदी नहीं थी। यह संस्थागत प्रतीकवाद था। और बंगाल में प्रतीकवाद अक्सर चुनावी गणित को दिशा देता है। प्रशासन क्या संदेश दे रहा था? प्रशासन भाषण नहीं देता—वह उपस्थिति से बोलता है। इ...