जब समय है, पर सवाल नहींआधुनिक मनुष्य की चुप होती आवाज़✨ भूमिकाएक समय थाजब सवाल यूँ ही पूछे जाते थे।उत्तर ज़रूरी नहीं थे,क्योंकि सवालों में हीकिसी के साथ होने का एहसास था।आज समय बहुत है—लेकिन सवाल नहीं हैं।यह चुप्पी ही हमारे दौर कीसबसे गहरी सच्चाई है।🕰️ सवालों का असली अर्थसवाल हमेशा ज्ञान के लिए नहीं होते।अक्सर सवाल का मतलब होता है—“क्या तुम मुझे सुन रहे हो?”“क्या मैं तुम्हारे लिए मायने रखता
⏳ जब समय है, पर सवाल नहीं आधुनिक मनुष्य की चुप होती आवाज़ ✨ भूमिका एक समय था जब सवाल यूँ ही पूछे जाते थे। उत्तर ज़रूरी नहीं थे, क्योंकि सवालों में ही किसी के साथ होने का एहसास था। आज समय बहुत है— लेकिन सवाल नहीं हैं। यह चुप्पी ही हमारे दौर की सबसे गहरी सच्चाई है। 🕰️ सवालों का असली अर्थ सवाल हमेशा ज्ञान के लिए नहीं होते। अक्सर सवाल का मतलब होता है— “क्या तुम मुझे सुन रहे हो?” “क्या मैं तुम्हारे लिए मायने रखता हूँ?” “क्या मैं अकेला हूँ?” पहले सवाल समय बिताने के लिए नहीं, अकेलापन कम करने के लिए पूछे जाते थे। 🧩 पहले सवाल क्यों होते थे? पहले सवाल थे, क्योंकि— लोग सुनने का धैर्य रखते थे बातचीत में जल्दबाज़ी नहीं थी रिश्ते गहरे और धीमे थे गलत समझे जाने का डर कम था सवाल एक भावनात्मक पुल थे। 🧠 आज सवाल क्यों नहीं हैं? आज सवाल नहीं हैं, क्योंकि— हर कोई व्यस्त है हर कोई सही साबित होना चाहता है सुनने वाला कम, बोलने वाला ज़्यादा है सवाल पूछना कमजोरी समझा जाता है आज लोग सवाल नहीं पूछते, क्योंकि उन्हें नज़रअंदाज़ होने का डर होता है। 🤐 क्या चुप्पी शांति है? नहीं। चुप्पी हमेशा शांति नहीं...