नीचे ब्लॉग – भाग 2 का हिंदी संस्करण प्रस्तुत है।Writingजंगल की सरायब्लॉग – भाग 2जब मैं उस प्राचीन सराय के भीतर कुछ देर तक खड़ा रहा, तब मेरी नज़र उन बातों पर पड़ी जिन्हें प्रवेश करते समय मैं देख नहीं पाया था।दीवारों पर कुछ पुरानी तस्वीरें टंगी थीं। समय की धूल ने उनके रंग लगभग मिटा दिए थे। यह पहचानना असंभव था कि वे किसकी तस्वीरें थीं। शायद वे किसी पुराने राजा की थीं, शायद किसी यात्री की, या शायद उन लोगों की, जिन्होंने सदियों पहले इसी सराय में बैठकर हँसी और बातचीत की होगी।
नीचे ब्लॉग – भाग 2 का हिंदी संस्करण प्रस्तुत है। Writing जंगल की सराय ब्लॉग – भाग 2 जब मैं उस प्राचीन सराय के भीतर कुछ देर तक खड़ा रहा, तब मेरी नज़र उन बातों पर पड़ी जिन्हें प्रवेश करते समय मैं देख नहीं पाया था। दीवारों पर कुछ पुरानी तस्वीरें टंगी थीं। समय की धूल ने उनके रंग लगभग मिटा दिए थे। यह पहचानना असंभव था कि वे किसकी तस्वीरें थीं। शायद वे किसी पुराने राजा की थीं, शायद किसी यात्री की, या शायद उन लोगों की, जिन्होंने सदियों पहले इसी सराय में बैठकर हँसी और बातचीत की होगी। दीवार पर एक पुरानी घड़ी टंगी हुई थी। उसकी सुइयाँ बिल्कुल स्थिर थीं। फिर भी समय आगे बढ़ रहा था। यह दृश्य मेरे मन में एक गहरा प्रश्न छोड़ गया। क्या समय वास्तव में घड़ी की सुइयों पर निर्भर करता है, या वह मनुष्य के बनाए हर उपकरण से स्वतंत्र होकर अपनी गति से बहता रहता है? अंगीठी में आग जल रही थी, लेकिन उसमें कोई लकड़ी नहीं डाल रहा था। उसकी लपटें न बढ़ रही थीं, न घट रही थीं। उनकी रोशनी फर्श पर लंबी परछाइयाँ बना रही थी, मानो बीते युगों की स्मृतियाँ अब भी वहीं भटक रही हों। सराय के बाहर जंगल पूरी तरह शांत था। न ...