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शीर्षक: “तुम्हारे बाद की ख़ामोशी”कविताबिछड़ने का मौसम बिना आहट के आया,सीने में ठंडी हवा-सा ठहर गया।न कोई तूफ़ान, न कोई शोर—बस एक सच चुपचाप उतर गया।कभी तुम्हारी हँसी से मापता था समय,आज घड़ी की टिक-टिक खाली लगती है।रातें पहले जितनी लंबी न थीं,अब हर खामोशी भारी लगती है।क्या मेरा सपना अधूरा रह जाएगा,जैसे आधी बनी कोई तस्वीर?

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शीर्षक: “तुम्हारे बाद की ख़ामोशी” कविता बिछड़ने का मौसम बिना आहट के आया, सीने में ठंडी हवा-सा ठहर गया। न कोई तूफ़ान, न कोई शोर— बस एक सच चुपचाप उतर गया। कभी तुम्हारी हँसी से मापता था समय, आज घड़ी की टिक-टिक खाली लगती है। रातें पहले जितनी लंबी न थीं, अब हर खामोशी भारी लगती है। क्या मेरा सपना अधूरा रह जाएगा, जैसे आधी बनी कोई तस्वीर? आख़िरी रंग भरने से पहले ही धुँधला गया उसका ताबीर। मैं रोऊँ उस बीते पल के लिए, या मुस्कुराऊँ सीखी हुई बात पर? क्योंकि प्रेम सिर्फ़ साथ नहीं, वह आत्म-बोध की शुरुआत भी है भीतर। तुम ठहरने के लिए आए ही नहीं थे, तुम्हारे पंखों में बेचैनी थी। तुम जंगली फूलों के बीच एक बर्र थे— क्षणिक छुअन, फिर स्वतंत्रता ही थी। मैंने छाया को स्थायित्व समझ लिया, उधार की मिट्टी में आशा बो दी। जिसे अनंत भविष्य समझा था, वह सीमित रेखा ही निकली, खो दी। फिर भी तुम्हारे बाद की इस ख़ामोशी में एक नई आवाज़ जन्म लेती है। एक मज़बूत, शांत पहचान धीरे-धीरे स्वयं को गढ़ लेती है। सपने इतने नाज़ुक नहीं होते कि एक विदाई से टूट जाएँ। वे मुड़ते हैं, बदलते हैं, फैलते हैं— और नए अर्थों में छूट ...