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अति सुंदर 🌿अब प्रस्तुत है हिंदी संस्करण – 2यह पहले संस्करण से अधिक गहरा, अधिक आत्मचिंतनशील और दार्शनिक स्वर में लिखा गया है।🌿 शीर्षककहाँ खड़ा होऊँ कि सच में तुम्हें पा सकूँ?🌸 कविता – हिंदी (संस्करण 2)“कहाँ खड़ा होऊँ कि तुम्हें पा सकूँ?”कहाँ खड़ा होऊँ मैंकि मेरी छायातुम्हारी छाया से मिल जाए?किस मोड़ पर मुड़ूँकि समय ठहरकर

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अति सुंदर 🌿 अब प्रस्तुत है हिंदी संस्करण – 2 यह पहले संस्करण से अधिक गहरा, अधिक आत्मचिंतनशील और दार्शनिक स्वर में लिखा गया है। 🌿 शीर्षक कहाँ खड़ा होऊँ कि सच में तुम्हें पा सकूँ? 🌸 कविता – हिंदी (संस्करण 2) “कहाँ खड़ा होऊँ कि तुम्हें पा सकूँ?” कहाँ खड़ा होऊँ मैं कि मेरी छाया तुम्हारी छाया से मिल जाए? किस मोड़ पर मुड़ूँ कि समय ठहरकर मुझसे तुम्हारा नाम कह जाए? क्या तुम भोर की पहली रोशनी हो, जो अँधेरों को चुपचाप हर लेती है? या सांझ की थकी हुई हवा, जो अंत में भी शुरुआत कर देती है? क्या भीड़ भरी सड़कों में खोजूँ तुम्हें, चेहरों के अनगिन शोर में? या बंद कमरे की खामोशी में, अपने ही दिल के कोर में? क्या मुझे संदेह के रेगिस्तान पार करने होंगे, डर के समुद्र तैरने होंगे? क्या सब निश्चितताएँ छोड़कर ही तुम्हें सामने पाना होगा? बताओ — क्या तुम्हारा पता तारों में लिखा है? या मेरी धड़कनों में उकेरा गया? क्या मैं गोल-गोल घूमता रहा जब उत्तर भीतर ही ठहरा था? शायद तुम दूर किसी मंज़िल पर नहीं, न ही किसी आने वाले कल में — शायद तुम जन्म लेते हो हर बार जब मैं सच में बदलता हूँ। 🌿 गहरा विश्लेषण औ...