आँखें: हमारे शरीर की मौन शक्तिभाग 4: कोमल नेत्र-अभ्यास और दृश्य-विश्राम की कलाआँखों को बल नहीं—विश्राम चाहिएनेत्र-देखभाल को लेकर एक आम गलतफहमी यह है कि आँखों को भी जिम की तरह “कठोर प्रशिक्षण” चाहिए।आँखें बल का अच्छा जवाब नहीं देतीं।वे छूट और शिथिलता का जवाब देती हैं।आज आँखों की अधिकतर असहजता कमजोरी से नहीं,बल्कि लगातार, बिना टूटे तनाव से पैदा होती है।जब दृश्य-तंत्र को नरमी से आराम मिलता है,तो उसकी स्वाभाविक कार्यक्षमता अक्सर खुद-ब-खुद बेहतर होने लगती है।दृश्य-विविधता का सिद्धांतप्रकृति में आँखें कभी लंबे समय तक स्थिर नहीं रहतीं।दूरी बदलती रहती है।रोशनी बदलती रहती है।फोकस अपने आप समायोजित होता है।आधुनिक जीवन इस विविधता को हटा देता है और उसकी जगह एकरसता रख देता है।आँखों की देखभाल का मतलब “और ज़्यादा करना” नहीं,
आँखें: हमारे शरीर की मौन शक्ति भाग 4: कोमल नेत्र-अभ्यास और दृश्य-विश्राम की कला आँखों को बल नहीं—विश्राम चाहिए नेत्र-देखभाल को लेकर एक आम गलतफहमी यह है कि आँखों को भी जिम की तरह “कठोर प्रशिक्षण” चाहिए। आँखें बल का अच्छा जवाब नहीं देतीं। वे छूट और शिथिलता का जवाब देती हैं। आज आँखों की अधिकतर असहजता कमजोरी से नहीं, बल्कि लगातार, बिना टूटे तनाव से पैदा होती है। जब दृश्य-तंत्र को नरमी से आराम मिलता है, तो उसकी स्वाभाविक कार्यक्षमता अक्सर खुद-ब-खुद बेहतर होने लगती है। दृश्य-विविधता का सिद्धांत प्रकृति में आँखें कभी लंबे समय तक स्थिर नहीं रहतीं। दूरी बदलती रहती है। रोशनी बदलती रहती है। फोकस अपने आप समायोजित होता है। आधुनिक जीवन इस विविधता को हटा देता है और उसकी जगह एकरसता रख देता है। आँखों की देखभाल का मतलब “और ज़्यादा करना” नहीं, बल्कि देखने का तरीका बदलना है। विविधता—दृष्टि का पोषण है। 20–20–20 नियम दृश्य-विश्राम की सबसे सरल और प्रभावी आदतों में से एक है 20–20–20 नियम। हर 20 मिनट में: कम से कम 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखें कम से कम 20 सेकंड तक यह कोमल अभ्यास: फोकस करने वाली मा...