Posts

Showing posts with the label जाती

कोई भी व्यक्ति जन्म से महान नहीं होता।महानता अभ्यास से आती है।संबंध और कर्मरिश्ते जन्म से मिल सकते हैं,पर विश्वास कमाना पड़ता है।लोग याद रखते हैं: आपने साथ दिया या नहीं,आपने वादा निभाया या नहीं।यहाँ भाग्य की कोई भूमिका नहीं।जब भाग्य साथ नहीं देताकिस्मत बदलती रहती है।सफलता स्थायी नहीं होती।लेकिन कर्म स्थिर रहता है।जो व्यक्ति सिर्फ किस्मत पर भरोसा करता है,वह टूट जाता है।जो व्यक्ति कर्म पर खड़ा होता है,वह परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल लेता है।भाग 1 का निष्कर्षभाग्य शुरुआत तय कर सकता है।अंत नहीं।पहचान खोजी नहीं जाती,बनाई जाती है।हर दिन।हर निर्णय से।हर कर्म से।

Image
1️⃣ कविता शीर्षक: भाग्य से परे पहचान भाग्य नहीं जिसे चुनना पड़े, सितारे भी नहीं बताते हम क्या बनेंगे। रास्ते लिखे नहीं होते आसमान पर, वे बनते हैं हमारे कदमों के दबाव से। किस्मत दरवाज़ा खोल सकती है, पर भीतर जाने का साहस हमारा होता है। समय प्रश्न नहीं करता, कर्म उसे अर्थ देता है। रक्त रिश्तों का नाम दे सकता है, पर अपने लोग कर्म से पहचाने जाते हैं। विश्वास विरासत नहीं होता, वह बनता है आचरण की अग्नि में। जब सौभाग्य मुंह मोड़ लेता है, कर्म फिर भी जागता रहता है। क्योंकि पहचान संयोग नहीं, वह बनती है निरंतर प्रयास से। 2️⃣ कविता का विश्लेषण और दर्शन यह कविता भाग्यवाद (Fatalism) के विरुद्ध एक शांत विचार प्रस्तुत करती है। यह भाग्य को पूरी तरह नकारती नहीं, बल्कि उसे उसकी सीमा में रखती है। मुख्य दार्शनिक विचार: 1. भाग्य बनाम कर्म भाग्य परिस्थितियाँ देता है — जन्म, समय, परिवार। लेकिन व्यक्ति कैसा बनेगा, यह कर्म तय करता है। 2. पहचान अर्जित की जाती है पहचान कोई उपहार नहीं। यह बार-बार किए गए कर्मों से बनती है। 3. संबंध कर्म से बनते हैं रिश्ते खून से मिल सकते हैं, पर अपनापन आचरण से मिलता है।...