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ब्लॉग चिंतनजब प्रेम पर्याप्त नहीं होताहम सोचते हैं कि प्रेम हो तो सब संभव है।लेकिन सच यह है—प्रेम आवश्यक है,पर हमेशा पर्याप्त नहीं।दो लोग एक-दूसरे को चाह सकते हैं,फिर भी—उनका समय अलग होउनके सपने अलग होंउनकी तैयारी अलग होऔर तब संबंध रुक जाता है,पर भावना नहीं।छोड़ देना ही परिपक्वता हैछोड़ देना हार नहीं है।यह कहना है—“मैं तुम्हें चुनता,पर जीवन के निर्णय को स्वीकार करता हूँ।”यह भावनात्मक शक्ति का सबसे ऊँचा स्तर है।🌅 अंतिम विचारशायद कुछ प्रेम रहने के लिए नहीं आते—जगाने के लिए आते हैं।शायद नियति छीनती नहीं,बस बदल देती है।अंत में जो लिखा थावह वियोग नहीं—वह अनुभव था।और उस अनुभव का नाम है—प्रेम।⚠️ अस्वीकरणयह लेख साहित्यिक और दार्शनिक चिंतन के लिए लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की पेशेवर मानसिक स्वास्थ्य सलाह नहीं है। यदि आप गहरे भावनात्मक तनाव से गुजर रहे हैं, तो कृपया योग्य विशेषज्ञ से संपर्क करें।

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🌑 शीर्षक: “तुम मेरे नहीं थे, फिर भी मैंने तुम्हें चाहा” ✨ कविता (हिंदी संस्करण 3) तुम्हारे लिए आसमान थाम लेना चाहता था, तूफ़ानों से पहले बादल हटा देना चाहता था, तुम्हारी चुप आँसुओं में अपनी सारी ताकत भर देना चाहता था। सोचा था अगर प्रेम सच्चा हो, तो किस्मत भी झुक जाएगी, दो दिल अगर साथ खड़े हों, तो दुनिया भी रुक जाएगी। पर नियति की दीवारें चुप थीं, उनकी ईंटें अदृश्य मगर कठोर, मेरी हर कोशिश जा टकराई एक अनकहे अंत के उस पार। तुम्हारा नाम जब दुआ नहीं बना था, तुम्हारी छवि जब आदत नहीं हुई थी, शायद उससे पहले ही तय हो गया था— यह कहानी मेरी नहीं थी। मैं रुकना चाहता था, सचमुच रुकना चाहता था, टूटे पलों से एक “हमेशा” गढ़ना चाहता था। पर समय की हड्डियों में लिखा था— तुम बस गुजरोगे मेरे दिल से, ठहरोगे नहीं, पर हमेशा रहोगे मेरी रूह के हिस्से। मैंने तुम्हें गुस्से में नहीं खोया, न अहंकार में, न शिकायत में, मैंने तुम्हें खोया उस जगह जहाँ एहसास जीतता है, पर ज़िंदगी फैसला बदल देती है। इसलिए आज तुम्हें याद रखता हूँ घाव बनाकर नहीं, बल्कि सबूत बनाकर— कि एक दिन मेरा दिल सच में जागा था। अगर प्रेम मेरी...