अब प्रस्तुत है हिंदी – भाग 2“वो गलियाँ जहाँ तुम कभी आए ही नहीं” का विस्तृत और गहन विस्तार।वो गलियाँ जहाँ तुम कभी आए ही नहीं – भाग 2जब स्वीकार ही शक्ति बन जाता हैभाग 13: सच स्वीकार करने के बाद की शांतिएक प्रकार की शांति होती हैजो अकेलेपन की नहीं होती,जो हार की भी नहीं होती।वह समझ की शांति होती है।जब आप भीतर से स्वीकार कर लेते हैं—“वह वास्तव में कभी आया ही नहीं।”तब कुछ बदल जाता है।इंतज़ार धीरे-धीरे रुक जाता है।मन में बनाए गए संवाद मिटने लगते हैं।कल्पनाओं का भविष्य धुंधला हो जाता है।लेकिन अजीब बात यह है—
अब प्रस्तुत है हिंदी – भाग 2 “वो गलियाँ जहाँ तुम कभी आए ही नहीं” का विस्तृत और गहन विस्तार। वो गलियाँ जहाँ तुम कभी आए ही नहीं – भाग 2 जब स्वीकार ही शक्ति बन जाता है भाग 13: सच स्वीकार करने के बाद की शांति एक प्रकार की शांति होती है जो अकेलेपन की नहीं होती, जो हार की भी नहीं होती। वह समझ की शांति होती है। जब आप भीतर से स्वीकार कर लेते हैं— “वह वास्तव में कभी आया ही नहीं।” तब कुछ बदल जाता है। इंतज़ार धीरे-धीरे रुक जाता है। मन में बनाए गए संवाद मिटने लगते हैं। कल्पनाओं का भविष्य धुंधला हो जाता है। लेकिन अजीब बात यह है— खालीपन नहीं आता। आती है स्पष्टता। स्पष्टता शांत होती है, पर अत्यंत शक्तिशाली होती है। भाग 14: हम भावनात्मक भ्रम क्यों रचते हैं? मनुष्य स्वभाव से कहानी बनाने वाला प्राणी है। जब जानकारी अधूरी होती है, हम उसे कल्पना से पूरा कर देते हैं। यदि कोई कभी-कभार ध्यान दे, हम उसे निरंतर प्रेम समझ लेते हैं। यदि कोई एक दिन गहराई से सुन ले, हम सोचते हैं वह जीवन भर समझेगा। यह मूर्खता नहीं है। यह आशा है। लेकिन प्रमाण के बिना आशा कभी-कभी आत्म-छल बन जाती है। और आत्म-छल ही दिल टूटने...