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जीवन का मेला – भाग 3(आकांक्षा, न मिल पाने और आत्म-जागरण की गहराई)अध्याय 16: उम्मीद का रूप बदलनाशुरुआत में उम्मीद बाहर देखती है।वह भीड़ में एक चेहरा खोजती है।दूर से आती आहट सुनने की कोशिश करती है।किसी परिचित आवाज़ का इंतज़ार करती है।लेकिन समय के साथ उम्मीद बदलने लगती है।वह पूछना छोड़ देती है —“तुम कब आओगे?”और पूछना शुरू करती है —“यह इंतज़ार मुझे क्या सिखा रहा है?”यहीं से यात्रा बदलती है।बाहरी खोज,

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जीवन का मेला – भाग 3 (आकांक्षा, न मिल पाने और आत्म-जागरण की गहराई) अध्याय 16: उम्मीद का रूप बदलना शुरुआत में उम्मीद बाहर देखती है। वह भीड़ में एक चेहरा खोजती है। दूर से आती आहट सुनने की कोशिश करती है। किसी परिचित आवाज़ का इंतज़ार करती है। लेकिन समय के साथ उम्मीद बदलने लगती है। वह पूछना छोड़ देती है — “तुम कब आओगे?” और पूछना शुरू करती है — “यह इंतज़ार मुझे क्या सिखा रहा है?” यहीं से यात्रा बदलती है। बाहरी खोज, आंतरिक खोज बन जाती है। यही जीवन के मेले का मोड़ है। अध्याय 17: स्मृतियों का बोझ कई बार हमें रोक कर रखने वाली केवल उम्मीद नहीं होती — स्मृति भी होती है। स्मृतियाँ बीते हुए क्षणों को जीवित रखती हैं। बातचीतों को दोहराती हैं। भावनाओं को काँच की तरह सँभाल कर रखती हैं। जीवन के मेले में स्मृति एक निजी दीपक की तरह है। लेकिन अगर हम उसे बहुत कस कर पकड़ लें, तो वह हमें आगे बढ़ने से रोक सकती है। इसलिए सीखना पड़ता है— स्मृति का सम्मान करना, पर उसका कैदी न बनना। अध्याय 18: कोमल बने रहने का साहस न मिल पाने का दर्द दिल को कठोर बना सकता है। प्रतीक्षा, नाराज़गी में बदल सकती है। देरी, नि...