जीवन का मेला – भाग 2(दार्शनिक और भावनात्मक चिंतन की निरंतरता)अध्याय 7: स्थायित्व का भ्रमजीवन के मेले का सबसे बड़ा भ्रम है — स्थायित्व।जब हम मेले में चलते हैं, तो लगता है कि रोशनी कभी नहीं बुझेगी,संगीत कभी नहीं रुकेगा,भीड़ कभी कम नहीं होगी।लेकिन हम जानते हैं —सुबह होते ही सब सिमट जाएगा।जीवन भी ऐसा ही है।
जीवन का मेला – भाग 2 (दार्शनिक और भावनात्मक चिंतन की निरंतरता) अध्याय 7: स्थायित्व का भ्रम जीवन के मेले का सबसे बड़ा भ्रम है — स्थायित्व। जब हम मेले में चलते हैं, तो लगता है कि रोशनी कभी नहीं बुझेगी, संगीत कभी नहीं रुकेगा, भीड़ कभी कम नहीं होगी। लेकिन हम जानते हैं — सुबह होते ही सब सिमट जाएगा। जीवन भी ऐसा ही है। हम सोचते हैं — यह संबंध हमेशा रहेगा। यह सफलता हमें हमेशा परिभाषित करेगी। यह दर्द कभी खत्म नहीं होगा। परंतु कुछ भी स्थायी नहीं है। “तुम्हें न पाना” आज जितना तीव्र है, समय उसे बदल देगा। मेला हमें सिखाता है — अस्थिरता ही सत्य है। और अस्थिरता हमें विनम्र बनाती है। अध्याय 8: उस क्षण को खो देने का भय वह गली में क्यों खड़ा है? क्योंकि उसे डर है। अगर वह चला गया और उसी क्षण तुम आ गए तो? यह डर हम सबके भीतर कहीं न कहीं रहता है। हम रुक जाते हैं क्योंकि — शायद कल सब बदल जाए। शायद एक और प्रयास से सब ठीक हो जाए। शायद चमत्कार बस होने ही वाला हो। मेला केवल आशा का स्थान नहीं, दुविधा का भी स्थान बन जाता है। और दुविधा हमें दुख और संभावना के बीच रोक कर रखती है। अध्याय 9: भीड़ में पहचान ...